Politics·

22 दिन विदेश टूर, 2 दिन प्रचार, ‘चुनाव आता-जाता रहेगा’:तेजस्वी आखिर चाहते क्या हैं, प्रशांत किशोर BJP से ज्यादा RJD के लिए बड़ा खतरा; 4 कारण

22 दिन विदेश टूर, 2 दिन प्रचार, ‘चुनाव आता-जाता रहेगा’:तेजस्वी आखिर चाहते क्या हैं, प्रशांत किशोर BJP से ज्यादा RJD के लिए बड़ा खतरा; 4 कारण

पटना के बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत BJP के लिए ज्यादा खतरे की घंटी है या तेजस्वी यादव के लिए। जवाब है-दोनों के लिए। लेकिन सबसे ज्यादा खतरा तेजस्वी यादव को है। ऐसा क्यों, समझेंगे; बूझे की नाही में...। तेजस्वी यादव के लिए प्रशांत किशोर बड़ा खतरा क्यों... 1. ‘पार्ट टाइम पॉलिटिशियन’ की इमेज बनी रही तो बढ़ेगी मुश्किल RJD नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की इमेज पार्ट टाइम पॉलिटिशिन की बनती जा रही है। BJP-JDU नेता उन्हें नान सीरियस पॉलिटिशिन कहते हैं। तेजस्वी यादव की ऐसी इमेज क्यों बन रही है, इसे बीते 9 महीने में हुई इन 7 घटनाओं से समझिए... तेजस्वी यादव पर उनकी बहन रोहिणी आचार्य ने भी बिना नाम लिए तंज कसा है और उनकी राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाया है। 3 अगस्त को रोहिणी ने X पर लिखा, ‘बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से फिर साबित हो गया कि जीत उसकी जरूर होती है, जो लगातार लड़ता है, जनता से जिसका निरंतर जुड़ाव होता है, जो कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों का सम्मान करता है और उनके साथ संपर्क व संवाद कायम रखता है।' 2. 36% जेन-Z वोटर, उनको जाति नहीं, समस्या का समाधान चाहिए बिहार देश का सबसे युवा राज्य है। नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में राज्य की 23.05% आबादी 18-29 साल की उम्र के लोगों की है। वहीं, 7.42 करोड़ वोटरों में से 36.72% वोटर 18-29 साल के बीच के हैं। मतलब 2.72 करोड़ वोटर जेन-Z हैं। लेखक चेतन भगत कहते हैं, 'राजनेताओं को जेन-जी के प्रति कोरे दिखावे और खोखले सिम्बॉलिज्म से सावधान रहना चाहिए। महज युवाओं जैसे कपड़े पहनने, स्लैंग बोलने और ‘मुझे युवा लोग पसंद हैं’ कहने भर से उनका दिल नहीं जीता जा सकता है। वास्तव में जो चीज काम आएगी, वह है वास्तविकता। सच्ची वास्तविकता, जिसमें आप अपनी ताकत के साथ अपनी सीमाओं और खामियों को भी बताने को तैयार हों।' 3. मुस्लिम वोटरों में भरोसा पैदा नहीं किया तो छोड़ सकते हैं साथ तेजस्वी यादव के सामने अभी सबसे ज्यादा चिंता अपने मुस्लिम वोटरों को सहेजकर रखने की है। बिहार में मुस्लिम वोटर पारंपरिक रूप से RJD (M-Y समीकरण) का मुख्य आधार रहे हैं। हालांकि, लंबे समय से यह शिकायत रही है कि वोट के अनुपात में उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और आर्थिक विकास में उचित हिस्सेदारी नहीं मिली। प्रशांत किशोर ने अपनी पदयात्रा के दौरान आबादी के अनुपात में टिकट देने का वादा किया था। मुस्लिम समाज के अंदरखाने मंथन जारी है। चूंकि मुस्लिम समाज लालू फैमिली के साथ तब तक ही जुड़ा है, जब तक उसे कोई भाजपा को हराने वाला मजबूत दावेदार नहीं मिल जाता। अगर मुस्लिम समाज को लगेगा कि तेजस्वी भाजपा को नहीं रोक सकते, तो वह तुरंत साथ छोड़ देगा। बांकीपुर उपचुनाव का रिजल्ट इसका उदाहरण है। 4. सड़क पर नहीं किया संघर्ष तो बिखर सकते हैं यादव बिहार में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बना दिया है। अब नीतीश कुमार का दौर खत्म हो गया है। ऐसी सूरत में सत्ता की एक खिड़की बंद हो गई। लालू फैमिली के साथ अभी भी यादव समाज एकजुटता से जुड़ा है। इसमें कोई इफ-बट नहीं है। BJP के लिए PK खतरा, लेकिन तेजस्वी से कम क्यों 1. BJP कोर्स करेक्शन करने में माहिर BJP अपनी रणनीति में बदलाव करने में माहिर है। वह हार से तुरंत सबक लेकर अपनी नीतियों में बदलाव करती है। साथ ही टफ डिसीजन लेने के लिए जानी जाती है। चुनावों के रिजल्ट के बाद किसी भी असंतोष या नए खिलाड़ी के उभार का संकेत मिलते ही शीर्ष नेतृत्व और RSS कैडर जमीनी स्तर पर फीडबैक लेकर अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव करता है। 2. कोर वोटरों का PK की तरफ झुकाव तात्कालिक है, स्थायी नहीं फील्ड से मिल रही जानकारी के मुताबिक, बांकीपुर में भाजपा के कोर वोटरों की नाराजगी तात्कालिक है। स्थायी नहीं। पार्टी उसे स्थायी नहीं बनने देगी। अगले कुछ महीनों में सरकार के फैसलों और पार्टी के निर्णयों में इसका असर दिखेगा। 3. BJP के पास पर्याप्त संसाधन, मजबूत सामाजिक आधार भाजपा राज्य से लेकर केंद्र तक सरकार में है। उसके पास लोगों को मैनेज करने के लिए पर्याप्त संसाधन है। साथ ही राज्य में भाजपा का कैडर और गठबंधन केवल सवर्णों तक सीमित नहीं है, बल्कि गैर-यादव OBC, अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलितों के बीच एक मजबूत और बहुस्तरीय सामाजिक आधार है। PK का सामाजिक आधार अभी शुरुआती चरण में है और वे इस स्थापित समीकरण में बड़ा डेंट नहीं लगा पाए हैं। भाजपा के पास 'पन्ना प्रमुख' और 'बूथ स्तर' तक का एक अनुशासित और ट्रेन कैडर है, जो चुनाव के दिन वोटर को बूथ तक लाने की क्षमता रखता है। सिर्फ एक उपचुनाव से भाजपा के कोर वोटर और सामाजिक समीकरण के बिखरने की भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी। ...तो क्या BJP को PK से डरने की जरूरत नहीं है ऐसा बिल्कुल नहीं है। नई रणनीति बनाने के साथ-साथ BJP को 3 चीजें करनी होगी। 1. नीतीश कुमार की पार्टी JDU को बचाए रखना होगा बिहार में नीतीश कुमार के पास अभी भी 16% से ज्यादा वोट शेयर है। नीतीश कुमार के पास कुर्मी, EBC और न्यूट्रल वोटरों का एक बंच है। जिसके सहारे वह दो ध्रुवों BJP और RJD के बीच संतुलन का काम करते थे। अब नीतीश कुमार स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। पार्टी धीरे-धीरे उनके बेटे निशांत कुमार के हाथों में शिफ्ट हो रही है। निशांत को लेकर लोगों में संशय की स्थिति है। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार की पार्टी को हर हाल में भाजपा को बचाकर रखना होगा। अगर JDU का वोट शेयर डबल डिजिट यानी 10% से ऊपर रहा तो भाजपा की स्थिति मजबूत रहेगी। 2. पारंपारिक वोट बैंक के साथ-साथ न्यूट्रल वोटर्स को साधना भाजपा के कोर वोटर (सवर्ण, वैश्य समाज) उसे एक मजबूत आधार तो देते हैं, लेकिन सिर्फ कोर वोट बैंक के दम पर बिहार जैसे बड़े राज्य में बहुमत हासिल करना कठिन है। 3. भाजपा कार्यकर्ताओं के फीडबैक पर काम करना होगा अक्सर कार्यकर्ताओं की शिकायत होती है कि सरकार बनने के बाद शीर्ष नेतृत्व या नौकरशाही कैडर की बात नहीं सुनता। प्रशांत किशोर का जमीनी मॉडल डेटा और सीधी बातचीत पर आधारित है। ऐसे में उपेक्षित या असंतुष्ट कार्यकर्ता और स्थानीय नेता प्रशांत किशोर के विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं।

ONLY AVAILABLE IN PAID PLANS

This is a summary. Read the full article at the original source.

Read full article at bhaskar_hindi