कॉन्स्टेबल मजदूर बना, टीचर खेतों में काम कर रहा:22 हजार कैंडिडेट्स को नहीं पता सलेक्ट या फेल, 3 महीने में सुनवाई करेगा हाईकोर्ट
"सरकारी नौकरी का रिजल्ट आने पर मैंने मिठाई बंटवाई थी। लगा अब संघर्ष खत्म हो गया। प्राइवेट नौकरी छोड़ दी, परिवार ने भी राहत की सांस ली। लेकिन सात साल बाद भी मैं नियुक्ति पत्र नहीं मिला। आज खेत में मजदूरी करता हूं, रिश्तेदार ताने मारते हैं।" ये आपबीती कई कैंडिडेट़स की है। मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण विवाद ने ऐसे हजारों चयनित अभ्यर्थियों की जिंदगी जैसे रोक सी दी है। 87:13 फॉर्मूले के कारण करीब 11 हजार पद होल्ड हैं और चयनित उम्मीदवार वर्षों से नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के तीन महीने में सुनवाई पूरी करने के निर्देश के बाद जबलपुर हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हो चुकी है। आने वाला फैसला न सिर्फ इन अभ्यर्थियों का भविष्य तय करेगा, बल्कि प्रदेश की भर्ती व्यवस्था और आरक्षण नीति की दिशा भी निर्धारित करेगा। हमने ऐसे ही कैंडिडेट्स से बात की जो नौकरी के इंतजार में हैं, क्या बदला है उनकी जिंदगी में और क्या है ये पूरा आरक्षण विवाद...मंडे स्पेशल में जानिए। चार केस से समझिए कैसे बदली कैंडिडेट्स की जिंदगी 1. मजदूरी करने को मजबूर हुए बुरहानपुर के प्रदुम्न के लिए सरकारी नौकरी अब रोज की मानसिक प्रताड़ना बन गई है। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने बीटेक की पढ़ाई पूरी की। पिता ने खेतों में काम करके और कर्ज लेकर उनकी फीस भरी। परिवार का सपना था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलेगी और आर्थिक स्थिति सुधरेगी। प्रदुम्न ने सरकारी नौकरी की तैयारी की और ईएसबी की ITI TO भर्ती परीक्षा में चयनित भी हो गए। इस दौरान वे छोटी-मोटी नौकरी भी कर रहे थे, लेकिन चयन के बाद सरकारी नौकरी की उम्मीद में वह नौकरी छोड़ दी। अब न पोस्टिंग मिल रही है और न ही दूसरी नौकरी कर पा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि पिता के साथ खेत में काम करना पड़ रहा है। उनकी शादी हो चुकी है और एक छोटी बेटी भी है। 2. दो परीक्षाओं के रिजल्ट होल्ड जबलपुर की रहने वाली आरती पटेल वर्ग-1 शिक्षक भर्ती 2023 में चयनित हुई थीं। इसके अलावा वर्ग-2 शिक्षक भर्ती 2024 में भी उनका चयन हो चुका है, लेकिन दोनों ही परीक्षाओं का रिजल्ट होल्ड पर है। आरती के पति इलेक्ट्रिशियन हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आरती अतिथि शिक्षक के तौर पर स्कूल में पढ़ाती हैं और घर चलाने के लिए दूसरे छोटे-मोटे काम भी करती हैं। आरती कहती हैं, "मेरी उम्र 35 वर्ष से अधिक हो चुकी है। वर्षों की मेहनत, संघर्ष और इंतजार के बाद भी नियुक्ति नहीं मिल पाई। अब हमारी स्थिति ऐसी नहीं है कि बार-बार नई परीक्षाओं की तैयारी कर सकें। परिवार की जिम्मेदारियां हैं, बच्चों की देखभाल करनी होती है और आजीविका के लिए मजदूरी भी करनी पड़ती है। लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया अटकी हुई है, जिससे मानसिक रूप से बेहद परेशान और प्रताड़ित महसूस कर रही हूं।" 3. जैसे-तैसे गुजारा कर रहे रविंद्र सिंह गुर्जर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नौकरी की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं और परिवार चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है। रविंद्र कहते हैं, "मध्य प्रदेश पुलिस आरक्षक भर्ती में हमारा चयन हो चुका था। हमने सालों तक मेहनत की, दिन-रात तैयारी की और हर संघर्ष किया। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि मजदूरी, पहरेदारी और छोटे-मोटे काम करके गुजारा करना पड़ रहा है। ईंट, गारा और गिट्टी ढोनी पड़ती है। रिश्तेदार ताने मारते हैं कि चयन हो गया था तो नौकरी पर क्यों नहीं गए, अब भी घर पर क्यों बैठे हो।" 4. आर्थिक स्थिति बेहद खराब शिवपुरी की वर्षा लोधी की हालत और भी दयनीय है। पुलिसकर्मियों के साथ खिंचवाई गई सेल्फी को वॉट्सएप डीपी पर लगाने वाली वर्षा के लिए सरकारी नौकरी उनके और उनके परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती, लेकिन अब उनके हिस्से में सिर्फ इंतजार है। वर्षा कहती हैं, "पुलिस आरक्षक भर्ती में मुझे 156 अंक मिले थे। इतने अच्छे अंक होने के बावजूद मुझे 13 प्रतिशत ओबीसी होल्ड श्रेणी में डाल दिया गया। आज हालत यह है कि पुलिस की नौकरी मिलने की उम्मीद में वर्षों तक मेहनत करने के बाद भी मजदूरी करनी पड़ रही है। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि गैस सिलेंडर भरवाने तक के पैसे नहीं हैं। चूल्हा जलाने के लिए जंगल से लकड़ी लानी पड़ती है, तब घर में खाना बन पाता है।" सुप्रीम कोर्ट का अब तक का रुख अगस्त 2024: सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी में उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर लागू करने पर ऐतिहासिक फैसला दिया, जिससे देशभर में आरक्षण पर बहस तेज हुई। कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ जातियों या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सबसे निचले स्तर तक पहुंचना चाहिए। 19 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाएं वापस जबलपुर हाईकोर्ट भेजते हुए 90 दिनों के भीतर विशेष बेंच बनाकर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह छात्रों के भविष्य और राज्य की नौकरियों से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है, इसलिए अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। जून 2026: मुख्य न्यायाधीश बदलने के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की नई विशेष बेंच गठित की गई। कोर्ट का रुख: कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए कि इस मामले से जुड़ी सभी 91 फाइलों को एक साथ संकलित कर रोजाना सुनवाई के लिए तैयार रखा जाए। 15 जुलाई 2026: जबलपुर हाईकोर्ट की विशेष बेंच ने कोर्ट रूम नंबर-13 में दोपहर 2:30 बजे से नियमित (डे-टू-डे) सुनवाई शुरू की। कोर्ट का रुख: नई बेंच ने दोनों पक्षों के वकीलों को निर्देश दिया कि बिना उचित कारण स्थगन (तारीख) न मांगी जाए और बहस केवल कानूनी व संवैधानिक मुद्दों तक सीमित रखी जाए।
कॉन्स्टेबल मजदूर बना, टीचर खेतों में काम कर रहा:22 हजार कैंडिडेट्स को नहीं पता सलेक्ट या फेल, 3 महीने में सुनवाई करेगा हाईकोर्ट - कॉपी लिंक "सरकारी नौकरी का रिजल्ट आने पर मैंने मिठाई बंटवाई थी। लगा अब संघर्ष खत्म हो गया। प्राइवेट नौकरी छोड़ दी, परिवार ने भी राहत की सांस ली। लेकिन सात साल बाद भी मैं नियुक्ति पत्र नहीं मिला। आज खेत में मजदूरी करता हूं, रिश्तेदार ताने मारते हैं।" ये आपबीती कई कैंडिडेट़स की है। मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण विवाद ने ऐसे हजारों चयनित अभ्यर्थियों की जिंदगी जैसे रोक सी दी है। 87:13 फॉर्मूले के कारण करीब 11 हजार पद होल्ड हैं और चयनित उम्मीदवार वर्षों से नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के तीन महीने में सुनवाई पूरी करने के निर्देश के बाद जबलपुर हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हो चुकी है। आने वाला फैसला न सिर्फ इन अभ्यर्थियों का भविष्य तय करेगा, बल्कि प्रदेश की भर्ती व्यवस्था और आरक्षण नीति की दिशा भी निर्धारित करेगा। हमने ऐसे ही कैंडिडेट्स से बात की जो नौकरी के इंतजार में हैं, क्या बदला है उनकी जिंदगी में और क्या है ये पूरा आरक्षण विवाद...मंडे स्पेशल में जानिए। चार केस से समझिए कैसे बदली कैंडिडेट्स की जिंदगी 1. मजदूरी करने को मजबूर हुए बुरहानपुर के प्रदुम्न के लिए सरकारी नौकरी अब रोज की मानसिक प्रताड़ना बन गई है। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने बीटेक की पढ़ाई पूरी की। पिता ने खेतों में काम करके और कर्ज लेकर उनकी फीस भरी। परिवार का सपना था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलेगी और आर्थिक स्थिति सुधरेगी। प्रदुम्न ने सरकारी नौकरी की तैयारी की और ईएसबी की ITI TO भर्ती परीक्षा में चयनित भी हो गए। इस दौरान वे छोटी-मोटी नौकरी भी कर रहे थे, लेकिन चयन के बाद सरकारी नौकरी की उम्मीद में वह नौकरी छोड़ दी। अब न पोस्टिंग मिल रही है और न ही दूसरी नौकरी कर पा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि पिता के साथ खेत में काम करना पड़ रहा है। उनकी शादी हो चुकी है और एक छोटी बेटी भी है। 2. दो परीक्षाओं के रिजल्ट होल्ड जबलपुर की रहने वाली आरती पटेल वर्ग-1 शिक्षक भर्ती 2023 में चयनित हुई थीं। इसके अलावा वर्ग-2 शिक्षक भर्ती 2024 में भी उनका चयन हो चुका है, लेकिन दोनों ही परीक्षाओं का रिजल्ट होल्ड पर है। आरती के पति इलेक्ट्रिशियन हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आरती अतिथि शिक्षक के तौर पर स्कूल में पढ़ाती हैं और घर चलाने के लिए दूसरे छोटे-मोटे काम भी करती हैं। आरती कहती हैं, "मेरी उम्र 35 वर्ष से अधिक हो चुकी है। वर्षों की मेहनत, संघर्ष और इंतजार के बाद भी नियुक्ति नहीं मिल पाई। अब हमारी स्थिति ऐसी नहीं है कि बार-बार नई परीक्षाओं की तैयारी कर सकें। परिवार की जिम्मेदारियां हैं, बच्चों की देखभाल करनी होती है और आजीविका के लिए मजदूरी भी करनी पड़ती है। लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया अटकी हुई है, जिससे मानसिक रूप से बेहद परेशान और प्रताड़ित महसूस कर रही हूं।" 3. जैसे-तैसे गुजारा कर रहे रविंद्र सिंह गुर्जर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। नौकरी की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं और परिवार चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है। रविंद्र कहते हैं, "मध्य प्रदेश पुलिस आरक्षक भर्ती में हमारा चयन हो चुका था। हमने सालों तक मेहनत की, दिन-रात तैयारी की और हर संघर्ष किया। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि मजदूरी, पहरेदारी और छोटे-मोटे काम करके गुजारा करना पड़ रहा है। ईंट, गारा और गिट्टी ढोनी पड़ती है। रिश्तेदार ताने मारते हैं कि चयन हो गया था तो नौकरी पर क्यों नहीं गए, अब भी घर पर क्यों बैठे हो।" 4. आर्थिक स्थिति बेहद खराब शिवपुरी की वर्षा लोधी की हालत और भी दयनीय है। पुलिसकर्मियों के साथ खिंचवाई गई सेल्फी को वॉट्सएप डीपी पर लगाने वाली वर्षा के लिए सरकारी नौकरी उनके और उनके परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती, लेकिन अब उनके हिस्से में सिर्फ इंतजार है। वर्षा कहती हैं, "पुलिस आरक्षक भर्ती में मुझे 156 अंक मिले थे। इतने अच्छे अंक होने के बावजूद मुझे 13 प्रतिशत ओबीसी होल्ड श्रेणी में डाल दिया गया। आज हालत यह है कि पुलिस की नौकरी मिलने की उम्मीद में वर्षों तक मेहनत करने के बाद भी मजदूरी करनी पड़ रही है। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि गैस सिलेंडर भरवाने तक के पैसे नहीं हैं। चूल्हा जलाने के लिए जंगल से लकड़ी लानी पड़ती है, तब घर में खाना बन पाता है।" सुप्रीम कोर्ट का अब तक का रुख अगस्त 2024: सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी में उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर लागू करने पर ऐतिहासिक फैसला दिया, जिससे देशभर में आरक्षण पर बहस तेज हुई। कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ जातियों या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सबसे निचले स्तर तक पहुंचना चाहिए। 19 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाएं वापस जबलपुर हाईकोर्ट भेजते हुए 90 दिनों के भीतर विशेष बेंच बनाकर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह छात्रों के भविष्य और राज्य की नौकरियों से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है, इसलिए अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। जून 2026: मुख्य न्यायाधीश बदलने के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की नई विशेष बेंच गठित की गई। कोर्ट का रुख: कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए कि इस मामले से जुड़ी सभी 91 फाइलों को एक साथ संकलित कर रोजाना सुनवाई के लिए तैयार रखा जाए। 15 जुलाई 2026: जबलपुर हाईकोर्ट की विशेष बेंच ने कोर्ट रूम नंबर-13 में दोपहर 2:30 बजे से नियमित (डे-टू-डे) सुनवाई शुरू की। कोर्ट का रुख: नई बेंच ने दोनों पक्षों के वकीलों को निर्देश दिया कि बिना उचित कारण स्थगन (तारीख) न मांगी जाए और बहस केवल कानूनी व संवैधानिक मुद्दों तक सीमित रखी जाए।
This is a summary. Read the full article at the original source.
Read full article at bhaskar_hindi
