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बांकीपुर में BJP 422 में से 400 बूथों पर हारी:राजद की जमानत जब्त, भाजपा ‘अहंकार’ में डूबी, तेजस्वी से कैसे खिसके मुस्लिम

बांकीपुर में BJP 422 में से 400 बूथों पर हारी:राजद की जमानत जब्त, भाजपा ‘अहंकार’ में डूबी, तेजस्वी से कैसे खिसके मुस्लिम

पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव को जन सुराज के प्रशांत किशोर ने 19,323 वोटों से जीत लिया। राजद का यादव-मुसलमान समीकरण भी टूटा। पीके को हर वर्ग के लोगों ने वोट दिया। जिस जन सुराज को 9 महीने पहले 7717 वोट मिले उसके वोट आठ गुना से ज्यादा बढ़ गए। भाजपा को कमजोर प्रत्याशी देना और जीत को लेकर अति आत्मविश्वास भारी पड़ा। पार्टी बांकीपुर के 422 में से 400 बूथों पर हार गई। नितिन नवीन, रविशंकर प्रसाद, रामकृपाल समेत कई बड़े नेताओं के बूथों पर पार्टी पिछड़ गई। बांकीपुर में चौंकाने वाले रिजल्ट के पीछे क्या वजह है? पढ़िए रिपोर्ट..। पहले जानिए, वोटों का गणित, भाजपा ने कितना खोया, PK ने कितना पाया नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बांकीपुर में 41.39% वोटिंग हुई थी। मतदाताओं की कुल संख्या 3,79,402 थी, वोट 1,56,647 ने डाले। उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान हुआ। 34.30% वोटिंग हुई। 1,30,313 लोगों ने वोट दिए। मतलब 2025 की तुलना में 26334 वोट कम पड़े। भाजपा: 53,472 वोट घट गए 2025 में नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले। उन्होंने 51,936 वोटों के अंतर से चुनाव जीता। यह डाले गए कुल वोट का 33.07% था। 2026 के उपचुनाव में नीरज सिन्हा को 44827 वोट (34.4%) मिले। 9 महीने में भाजपा के 53,472 वोट घट गए। नितिन नवीन ने जितने वोटों की मार्जिन से चुनाव जीता, नीरज को उतने वोट भी नहीं मिले। जन सुराज: 9 महीने में 56,434 वोट बढ़े 2025 के चुनाव में जन सुराज की प्रत्याशी वंदना कुमारी को 7717 वोट (4.96%) मिले। जमानत जब्त हो गई। 2026 के उपचुनाव में जन सुराज के प्रशांत किशोर को 64,151 (49.23) वोट मिले। 56,434 वोट बढ़ गए। राजद: रेखा गुप्ता की जमानत जब्त 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद की प्रत्याशी रेखा गुप्ता दूसरे नंबर पर थीं। उन्हें 46,363 वोट (29.83%) मिले थे। 2026 में रेखा गुप्ता को 14,273 वोट (10.95%) मिले। उनकी जमानत जब्त हो गई। राजद के 32,090 वोट घट गए। बीजेपी का वोट शेयर क्यों खिसका? बांकीपुर पूरी तरह शहरी विधानसभा क्षेत्र है। यहां की आबादी में कायस्थ 15 फीसदी, भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत 20 से 22 फीसदी हैं। वैश्य की आबादी करीब 12 फीसदी है। ये वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा के कोर वोट बैंक माने जाते हैं। बांकीपुर की कुल आबादी में इनका हिस्सा करीब 50% है। यही वजह है कि भाजपा लगातार तीन दशक तक यह सीट जीतती रही। इस बार भाजपा का कोर वोट बैंक बिखर गया। इसकी मुख्य वजह हैं। 1 उम्मीदवार बदलना: भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा बंटी को टिकट दिया। परिजनों के चारा घोटाला से जुड़े होने और दूसरी वजहों के सामने आने पर अभिषेक से नाम वापस कराया और नीरज सिन्हा को टिकट दिया। इससे जनता को गलत संदेश गया। 2 स्थानीय संगठन की नाराजगी: पॉलिटिकल सर्किल में चर्चा है कि बांकीपुर में भाजपा की हार पार्टी की दिल्ली और पटना की अंदरूनी खींचतान का नतीजा है। सूत्रों के मुताबिक, बिहार भाजपा के नेता नितिन नवीन के एकतरफा कैंडिडेट सिलेक्शन से नाराज थे। यहां से जितने लोगों का नाम कैंडिडेट के तौर पर गया था, उसको नजरअंदाज कर प्रत्याशी दिया गया। बिहार कमेटी प्रशांत किशोर के सामने बड़ा चेहरा उतराना चाहती थी, लेकिन दिल्ली से एक सामान्य कार्यकर्ता को उतार दिया गया। जिसे पूरे विधानसभा एरिया में भी लोग ठीक से नहीं जानते थे। 3 पुराने कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता: बांकीपुर में 34.30% वोटिंग हुई। कम मतदान की स्थिति में चुनाव लड़ रही पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता बेहद अहम होती है। जिस पार्टी के कार्यकर्ता अपने वोटर को अधिक संख्या में बूथ तक लाने में कामयाब रहते हैं उसे सफलता मिलती है। भाजपा बूथ स्तर तक संगठन वाली पार्टी है। बांकीपुर में संगठन मजबूत है, लेकिन उपचुनाव में पुराने कार्यकर्ताओं का घर बैठ जाना पार्टी को नुकसान पहुंचा गया। भाजपा नेता कहते रहे कि बांकीपुर में तो जीत पक्की है। वोटर को भी यही संदेश गया कि जीत तय है। ऐसे में बहुत से लोग पोलिंग बूथ नहीं पहुंचे। वोटिंग प्रतिशत 2025 की तुलना में 7% कम रहा। 5 नितिन नवीन फैक्टर काम नहीं आया: बांकीपुर उपचुनाव में नितिन नवीन फैक्टर काम नहीं आया। वह खुद उम्मीदवार नहीं थे। इसके चलते उनका वोट बैंक पूरी ताकत से ट्रांसफर नहीं हुआ। प्रत्याशी तय करने से लेकर हर तरह की जिम्मेदारी नितिन नवीन को दी गई थी। पार्टी की टॉप लीडरशिप ने साफ कह दिया था-आपको जिसको टिकट देना है दीजिए। कोई आपत्ति नहीं है। राज्य के कुछ नेताओं की आपत्ति को भी टॉप लीडरशिप ने नजरअंदाज किया। अब सोशल मीडिया पर सवाल पूछा जा रहा है- जब राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी सीट नहीं जीता पाए तो वह पार्टी को 2027 में UP, पंजाब, उत्तराखंड कैसे जीता पाएंगे। सिर्फ एक क्षेत्र में आगे रही भाजपा जन सुराज को बोरिंग रोड, बुद्धा कॉलनी, कदमकुआं, मीठापुर, जयप्रकाश नगर और अशोक राजपथ जैसे इलाकों में बढ़त मिली। भाजपा को सिर्फ एक इलाका एएन कॉलेज-किदवईपुरी-पीएनटी कालोनी में 17 वोटों से बढ़त मिली। जेन-Z: लाठीचार्ज का बदला ‘स्कूल का बस्ता’ पर बटन दबाकर लिया 3.79 लाख वोटरों वाली बांकीपुर विधानसभा में 53,419 यानी 14% वोटर 29 साल से कम उम्र वाले हैं। मतलब जेन-Z वोटर हैं। भाजपा की हार में जेन-Z प्रोटेस्ट का बड़ा हाथ माना जा रहा है। UGC के नए नियम, भरत तिवारी एनकाउंटर, नाराज सवर्णों ने भाजपा से बनाई दूरी जनवरी में आए UGC इक्विटी रेगुलेशंस से सवर्ण समाज नाराज था। जहानाबाद NEET स्टूडेंट रेप-मर्डर केस और भरत तिवारी एनकाउंटर ने इस नाराजगी को और बढ़ा दिया। ‘कुत्ता-बिल्ली’ वाले कथित बयान को प्रशांत किशोर ने भुनाया चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने कहा, ‘भाजपा के नेता कहते हैं कि बांकीपुर हमारा ऐसा इलाका है, जहां से अगर कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा करेंगे तो लोग हमें जीता देंगे।’ इससे लोगों का गुस्सा भड़क गया। प्रशांत किशोर की जीत के 5 सबसे बड़े कारण 1- Anti-BJP और Anti-RJD दोनों वोट एक जगह आ गए प्रशांत किशोर ने गैर भाजपा और गैर राजद वोटरों को अपनी तरफ किया। शिक्षा, रोजगार, पलायन, सड़क, नाली और सफाई जैसे बुनियादी मुद्दे उठाए। यादवों और मुसलमानों को लगा कि तेजस्वी यादव ठीक से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वे दो दिन के रोड शो पर निकले बाकी ज्यादातर समय विदेश में रहे। यादवों के एक बड़े हिस्से को लगा कि बीजेपी से जन सुराज ही लड़ रही है। मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए राजद की जगह जन सुराज पर भरोसा किया। 2. जेन जी वोटर को नया विकल्प मिला बांकीपुर में 18 से 29 साल के 53,419 और 30 से 39 साल के 96,895 वोटर हैं। युवाओं को प्रशांत किशोर का बदलाव का नारा पसंद आया। पीके ने कैफे, कोचिंग हब्स, जिम और पार्कों में प्रचार किया। युवाओं और पीके के बीच की बातचीत और पॉड कास्ट की रील्स वॉट्सएप-इंस्टा पर डालीं। यह रणनीति काम आई। युवाओं ने पीके के रूप में बिहार की राजनीति में नया विकल्प देखा है। 3. स्थानीय मुद्दों पर लगातार फोकस प्रशांत किशोर की टीम गली-गली घूमती रही और दिखाती रही कि साफ-सफाई, सड़क और जल जमाव की स्थिति कैसी है। पीके खुद भी इसे नितिन नवीन का फेल्योर बताते रहे, जबकि यह काम नगर निगम के जिम्मे आता है। पीके लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे कि विधायक का दायित्व भी होता है कि इसे देखे। बांकीपुर पटना का एक प्रमुख शहरी इलाका है। प्रशांत किशोर और उनकी टीम पारंपरिक जातिगत नारों के बजाय ड्रेनेज/जलजमाव की समस्या, ट्रैफिक प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर, हायर एजुकेशन और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दों को उठाया। लोगों को मिलने वाली सुविधा पर ध्यान दिलाया। 4. शहरी सीट पर साफ-सुथरी राजनीति की ब्रांडिंग प्रशांत किशोर ने जनता के बीच अपनी ब्रांडिंग एक ऐसे नेता के रूप में की जो साफ-सुथरी राजनीति करता है। जनता की आवाज विधानसभा से लेकर दिल्ली तक उठा सकता है। उन्होंने लोगों के बीच कहा कि अपर आप मुझे जिताते हैं तो आपके साथ अन्याय होने पर दिल्ली तक आवाज उठाऊंगा। प्रशांत ने जाति और धर्म के समीकरण की जगह हर वर्ग के लोगों को अपनी ओर लाने की कोशिश की। घर-घर गए, लोगों से मिले। 5. त्रिकोणीय मुकाबले को BJP बनाम PK बना दिया चुनाव प्रचार के दौरान पीके ने तेजस्वी यादव पर हमला नहीं किया। उनके निशाने पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी रहे। बांकीपुर के उपचुनाव को सम्राट सरकार के लिए जनमत संग्रह बताया। इसका असर हुआ कि राजद समर्थक वोटर भाजपा को हराने के लिए जन सुराज का बटन दबाकर आ गए। दूसरी ओर भाजपा सरकार से नाराज लोगों ने राजद की जगह नए विकल्प के रूप में जन सुराज को चुना। RJD का कोर वोट बैंक क्यों नाराज रहा? 1- कमजोर संगठन: राजद को आज तक बांकीपुर में जीत नहीं मिली। राजधानी में होने के बाद भी यहां पार्टी का संगठन कमजोर है। इसकी भरपाई के लिए तेजस्वी दूसरे विधानसभा क्षेत्रों के नेताओं कार्यकर्ताओं को लगा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया। 2- उम्मीदवार चयन: 2025 का चुनाव रेखा गुप्ता 51,936 वोटों के अंतर से हारी थीं। उन्हें 46,363 वोट मिले थे। उपचुनाव में राजद ने उन्हें फिर से टिकट दिया। रेखा वैश्य समाज से आती हैं। वैश्य भाजपा समर्थक माने जाते हैं। रेखा को राजद के पारंपरिक वोट बैंक (यादव और मुसलमान) का बड़ा हिस्सा तक नहीं मिला। 3- तेजस्वी की सीमित मौजूदगी: बांकिपुर में उपचुनाव होने थे। बिहार विधानसभा में मानसून सत्र था, लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव छुट्टी मनाने विदेश चले गए। वह मानसून सत्र से पूरी तरह गायब रहे। बांकीपुर में भी आखिरी के दो दिन चुनाव प्रचार किया। इतना कम समय चुनावी हवा को अपनी तरफ करने के लिए पर्याप्त नहीं था। 4- ‘जीतने वाले विकल्प’ की तलाश: बांकीपुर के लोगों में भाजपा के खिलाफ नाराजगी थी। दूसरी ओर राजद समर्थक भी जानते थे कि उनकी पार्टी अपने दम पर भाजपा को नहीं हरा सकती। प्रशांत किशोर ने एग्रेसिव मोड में चुनाव लड़ा। सुबह से रात तक जनता के बीच गए। एक महीने में 150 चाय पर चर्चा और 50 जनसभाएं की। इससे पूरा चुनाव भाजपा बनाम प्रशांत किशोर हो गया। लोग जीतने वाले विकल्प की तलाश में पीके के पास गए। क्या हैं बांकीपुर उपचुनाव के संदेश? भाजपा के लिए: पारंपरिक समीकरण के भरोसे जीत का अति आत्मविश्वास घातक हो सकता है। प्रत्याशी चुनाव बेहतर करना होगा। वोटर यह भी देखते हैं कि उनका होने वाला विधायक कैसा हो। राजद के लिए: मुस्लिम यादव गठजोड़ टूट रहा है। सीमांचल में मुसलमान AIMIM की ओर जा रहे हैं तो बांकीपुर जैसे शहरी इलाके में जन सुराज की ओर चले गए। मुसलमान उसे वोट देंगे जो भाजपा को हराने की स्थिति में होगा। जन सुराज के लिए: बांकीपुर से विधानसभा में प्रवेश मिला है। यह भविष्य की सियासत के लिए लॉन्चिंग पैड हो सकता है। जनता नए विकल्प को मौका देने के लिए तैयार है। बिहार की राजनीति के लिए: जातीय ध्रुवीकरण से चुनाव जीतना पक्का नहीं। विपक्ष को एक नया चेहरा मिला है। नए राजनीतिक गठजोड़ हो सकते हैं। कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियों की नजदीकि पीके से बढ़ सकती है। अब जानिए क्या कहते हैं जानकार सीनियर जर्नलिस्ट कुमार प्रबोध कहते हैं, ‘बांकीपुर में जो हुआ वह एंटी इनकम्बेंसी नहीं थी। यह पूरी तरह बीजेपी के अहंकार की हार है। भाजपा यह सोचती है कि किसी को भी खड़ा कर देंगे और वह जीत जाएगा। अब यह नहीं चलेगा। लोगों ने अपना आक्रोश दिखाया है।’ ‘भाजपा के लोग तेजस्वी का डर दिखाते थे। बांकीपुर में जन सुराज के रूप में लोगों को तीसरा विकल्प मिला। यह भाजपा के लिए खतरे की चेतावनी की तरह है। आने वाले दिनों में स्थिति और खराब हो सकती है।’ सीनियर जर्नलिस्ट कुमार प्रबोध ने कहा, ‘दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन और पटना के छात्र आंदोलन ने दिखा दिया है कि जेन Z अब अहम भूमिका निभा रहे हैं। बांकीपुर उपचुनाव ने साबित किया है कि जेन Z कुछ भी कर सकते हैं। युवाओं ने अपनी ताकत दिखाई है।’ वरिष्ठ पत्रकार इंद्र भूषण कहते हैं, 'अगर प्रशांत किशोर इसी तरह जनता के लिए जूझते रहे और भाजपा-राजद के आरोपों से विचलित नहीं हुए तो आने वाले दिनों में बिहार में तीसरी राजनीति के सूत्रधार साबित हो सकते हैं। उन पर नई पीढ़ी भरोसा कर रही है। उनके मुद्दों को पसंद कर रही है।' 'उन्हें अपने कारवां (पार्टी तंत्र में) में निचले, पिछड़े तबकों की बात करने वाले उन्हीं के जमात के नेताओं को भी सम्मानजनक स्थान देना होगा। उन्हें ‘वन मैन आर्मी’ की सोच से आगे निकलना होगा। एक मजबूत ईमानदार और पारदर्शी स्थायी टीम बनानी होगी।'

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