मॉनसून सत्र में कांग्रेस से अलग दिखी DMK

तमिलनाडु : संसद के मॉनसून सत्र के दौरान विपक्षी दलों के बीच एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण और विवादित मुद्दों पर कांग्रेस के...
तमिलनाडु : संसद के मॉनसून सत्र के दौरान विपक्षी दलों के बीच एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण और विवादित मुद्दों पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन से अलग रुख अपनाया है। इससे विपक्ष के भीतर रणनीतिक मतभेदों की चर्चा तेज हो गई है।ताजा मामला गुरुवार को राज्यसभा में देखने को मिला, जब लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा और मतदान के दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट किया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने कथित NEET पेपर लीक और 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इन मुद्दों के विरोध में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने सदन से बहिर्गमन किया, लेकिन DMK ने इस रणनीति का साथ नहीं दिया और सदन में मौजूद रही।DMK के इस रुख ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि संसद के भीतर विपक्ष की प्रभावी रणनीति के लिए सभी दलों का एकजुट रहना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में किसी बड़े सहयोगी दल का अलग रास्ता अपनाना विपक्ष की सामूहिक रणनीति को प्रभावित कर सकता है।मॉनसून सत्र के दौरान यह पहला अवसर नहीं है जब DMK ने कांग्रेस से अलग रुख अपनाया हो। इससे पहले भी कुछ विधेयकों और संसदीय मुद्दों पर पार्टी का रुख अन्य विपक्षी दलों से अलग दिखाई दिया था। हालांकि DMK ने अपने फैसलों को लेकर सार्वजनिक रूप से विस्तृत टिप्पणी नहीं की है, लेकिन संसद में उसके व्यवहार ने राजनीतिक चर्चाओं को नया आयाम दे दिया है।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि क्षेत्रीय दल अक्सर राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद अपने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। इसी कारण कई बार संसद में उनकी रणनीति कांग्रेस या अन्य दलों से अलग दिखाई देती है।राज्यसभा में हुई वोटिंग के दौरान कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए वॉकआउट को राजनीतिक संदेश के रूप में इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि छात्रों से जुड़े गंभीर मुद्दों और कथित परीक्षा अनियमितताओं पर सरकार को अधिक जवाबदेह होना चाहिए। हालांकि DMK ने इस विरोध में शामिल न होकर सदन की कार्यवाही में भाग लेना जारी रखा।इस घटनाक्रम के बाद विपक्षी एकता को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष लगातार आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए साझा रणनीति बनाने की बात करता रहा है, लेकिन संसद के भीतर अलग-अलग दलों के अलग रुख से उस रणनीति की मजबूती पर बहस शुरू हो गई है।संसदीय मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न दलों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है। हालांकि जब विपक्ष किसी साझा मंच पर सरकार को घेरने की कोशिश करता है, तब इस प्रकार के मतभेद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।सरकार की ओर से पारित किए जा रहे विधेयकों और विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष की रणनीति आने वाले दिनों में भी चर्चा का विषय बनी रह सकती है। मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर बहस और मतदान होना बाकी है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी दल आगे किस प्रकार का साझा रुख अपनाते हैं।फिलहाल DMK के इस निर्णय ने यह संकेत दिया है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर सभी मुद्दों पर पूर्ण सहमति नहीं है। आने वाले दिनों में यदि इसी तरह विभिन्न दल अलग-अलग रणनीति अपनाते हैं, तो विपक्ष की एकजुटता को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो सकती हैं।संसद का मॉनसून सत्र अभी जारी है और राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर सभी की नजर बनी हुई है। ऐसे में यह स्पष्ट होगा कि विपक्ष अपने आंतरिक मतभेदों को किस तरह संभालता है और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर किस प्रकार की संयुक्त रणनीति तैयार करता है।
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