अंतरिक्ष से दिखा गजब का नजारा: ISRO-NASA के NISAR सैटेलाइट ने अंटार्कटिका में खोजी बर्फ की ‘हमिंगबर्ड’

अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और भारत के इसरो (ISRO) के बीच साझेदारी से बने ‘NISAR’ (सिंथेटिक एपरचर रडार) सैटेलाइट ने अंटार्कटिका की बर्फ से ढकी जमीन पर एक बेहद खूबसूरत और हैरान कर देने वाली तस्वीर कैद की है. यह आकृति पहली नज़र में एक उड़ती हुई ‘हमिंगबर्ड’ (गुंजन पक्षी) जैसी दिखाई देती है. नासा की रिपोर्ट के अनुसार, ‘हमिंगबर्ड’ जैसी दिखने वाली यह आकृति कोई वास्तविक पक्षी नहीं, बल्कि अंटार्कटिका के पहाड़ों, बर्फ की परतों और सैटेलाइट की आधुनिक रडार तकनीक का एक अनूठा संगम (इल्यूजन) है. नासा रिपोर्ट में कहा गया है, ‘साइंस और अचानक हुए इस खूबसूरत इत्तेफाक के मेल से, अंटार्कटिका के इस बंजर और उबड़-खाबड़ इलाके ने एक उड़ती हुई हमिंगबर्ड का रूप ले लिया है.’ यह तस्वीर NISAR के L-बैंड इंस्ट्रूमेंट से ली गई है, जो यह साबित करता है कि यह सैटेलाइट केवल वैज्ञानिक डेटा जुटाने में ही नहीं, बल्कि देखने में बेहद आकर्षक और सटीक तस्वीरें खींचने में भी माहिर है. तस्वीरों में दिखने वाले रंगों की पहेली नासा ने बताया कि इन तस्वीरों में दिख रहे अलग-अलग रंग दरअसल इस बात का सबूत हैं कि रडार से निकलने वाली माइक्रोवेव तरंगें (Signals) बर्फ की सतह से टकराकर किस तरह वापस लौटती हैं. जब NISAR सैटेलाइट अंटार्कटिका की सतह पर रडार तरंगें भेजता है, तो वे बर्फ या पहाड़ों से टकराकर वापस सैटेलाइट तक पहुंचती हैं. वे किस दिशा या रूप में वापस आ रही हैं, इसी से वहां की सतह का पता चलता है. रंग (Color) सिग्नल का प्रकार इसका क्या मतलब है? मजेंटा (गहरा गुलाबी) हॉरिजॉन्टल (Horizontal) सिग्नल ये सिग्नल सीधी और चिकनी बर्फ की सतह से टकराकर वापस आते हैं. हरा (Green) वर्टिकल (Vertical) सिग्नल ये सिग्नल बर्फ में थोड़ा अंदर तक जाकर या दरारों (Crevasses) से टकराकर बिखरते हैं (इसे वॉल्यूम स्कैटरिंग कहते हैं). सफेद (White) दोनों सिग्नल का मिश्रण जब मजेंटा और हरे सिग्नल बराबर मात्रा में टकराकर लौटते हैं, तो वह हिस्सा सफेद दिखता है. नासा के वैज्ञानिकों ने यह भी समझाया कि अगर हम इस इलाके को आम इंसानी आंखों से या किसी साधारण कैमरे से देखें, तो यह सिर्फ एक सफेद बर्फ की चादर जैसा दिखेगा. लेकिन रडार तकनीक ने बर्फ के नीचे छिपी सिलवटों, पहाड़ों की चोटियों और दरारों को अलग-अलग रंगों में उभार दिया. जलवायु परिवर्तन को समझने में मिलेगी मदद वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘हमिंगबर्ड’ जैसी यह मनमोहक तस्वीर केवल देखने में ही शानदार नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि NISAR सैटेलाइट कितना सटीक और पावरफुल है. ग्लेशियर की चाल पर नजर: यह सैटेलाइट अंटार्कटिका के उन दूरदराज इलाकों पर भी नजर रख सकता है, जहां इंसानों का पहुंचना नामुमकिन है. क्लाइमेट चेंज: ग्लेशियरों के खिसकने, बर्फ के पिघलने और ग्लोबल वार्मिंग के असर को समझने में यह डेटा बेहद मददगार साबित होगा. प्राकृतिक आपदाएं: इसके अलावा, यह दुनिया भर में लैंडस्लाइड (भूस्खलन), ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं की पहले से चेतावनी देने में भी सक्षम है. नासा और इसरो का मेल NISAR दुनिया का सबसे शक्तिशाली ‘अर्थ ऑब्जर्वेशन’ (पृथ्वी की निगरानी करने वाला) सैटेलाइट है. यह पहला ऐसा सैटेलाइट है जो दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी (L-बैंड और S-बैंड) वाले रडार का एक साथ इस्तेमाल करता है. L-बैंड: इसे नासा की ‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’ (JPL) ने तैयार किया है. S-बैंड: इसे भारत की ‘इसरो’ (ISRO) की लैब्स में बनाया गया है. इस ऐतिहासिक सैटेलाइट को भारत के श्रीहरिकोटा स्थित ‘सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र’ से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था, और अब यह अंतरिक्ष से पृथ्वी की हर छोटी-बड़ी हलचल पर अपनी पैनी नजर रखे हुए है.
अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और भारत के इसरो (ISRO) के बीच साझेदारी से बने ‘NISAR’ (सिंथेटिक एपरचर रडार) सैटेलाइट ने अंटार्कटिका की बर्फ से ढकी जमीन पर एक बेहद खूबसूरत और हैरान कर देने वाली तस्वीर कैद की है. यह आकृति पहली नज़र में एक उड़ती हुई ‘हमिंगबर्ड’ (गुंजन पक्षी) जैसी दिखाई देती है. नासा की रिपोर्ट के अनुसार, ‘हमिंगबर्ड’ जैसी दिखने वाली यह आकृति कोई वास्तविक पक्षी नहीं, बल्कि अंटार्कटिका के पहाड़ों, बर्फ की परतों और सैटेलाइट की आधुनिक रडार तकनीक का एक अनूठा संगम (इल्यूजन) है. नासा रिपोर्ट में कहा गया है, ‘साइंस और अचानक हुए इस खूबसूरत इत्तेफाक के मेल से, अंटार्कटिका के इस बंजर और उबड़-खाबड़ इलाके ने एक उड़ती हुई हमिंगबर्ड का रूप ले लिया है.’ यह तस्वीर NISAR के L-बैंड इंस्ट्रूमेंट से ली गई है, जो यह साबित करता है कि यह सैटेलाइट केवल वैज्ञानिक डेटा जुटाने में ही नहीं, बल्कि देखने में बेहद आकर्षक और सटीक तस्वीरें खींचने में भी माहिर है. तस्वीरों में दिखने वाले रंगों की पहेली नासा ने बताया कि इन तस्वीरों में दिख रहे अलग-अलग रंग दरअसल इस बात का सबूत हैं कि रडार से निकलने वाली माइक्रोवेव तरंगें (Signals) बर्फ की सतह से टकराकर किस तरह वापस लौटती हैं. जब NISAR सैटेलाइट अंटार्कटिका की सतह पर रडार तरंगें भेजता है, तो वे बर्फ या पहाड़ों से टकराकर वापस सैटेलाइट तक पहुंचती हैं. वे किस दिशा या रूप में वापस आ रही हैं, इसी से वहां की सतह का पता चलता है. | रंग (Color) | सिग्नल का प्रकार | इसका क्या मतलब है? | | मजेंटा (गहरा गुलाबी) | हॉरिजॉन्टल (Horizontal) सिग्नल | ये सिग्नल सीधी और चिकनी बर्फ की सतह से टकराकर वापस आते हैं. | | हरा (Green) | वर्टिकल (Vertical) सिग्नल | ये सिग्नल बर्फ में थोड़ा अंदर तक जाकर या दरारों (Crevasses) से टकराकर बिखरते हैं (इसे वॉल्यूम स्कैटरिंग कहते हैं). | | सफेद (White) | दोनों सिग्नल का मिश्रण | जब मजेंटा और हरे सिग्नल बराबर मात्रा में टकराकर लौटते हैं, तो वह हिस्सा सफेद दिखता है. | नासा के वैज्ञानिकों ने यह भी समझाया कि अगर हम इस इलाके को आम इंसानी आंखों से या किसी साधारण कैमरे से देखें, तो यह सिर्फ एक सफेद बर्फ की चादर जैसा दिखेगा. लेकिन रडार तकनीक ने बर्फ के नीचे छिपी सिलवटों, पहाड़ों की चोटियों और दरारों को अलग-अलग रंगों में उभार दिया. जलवायु परिवर्तन को समझने में मिलेगी मदद वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘हमिंगबर्ड’ जैसी यह मनमोहक तस्वीर केवल देखने में ही शानदार नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि NISAR सैटेलाइट कितना सटीक और पावरफुल है. - ग्लेशियर की चाल पर नजर: यह सैटेलाइट अंटार्कटिका के उन दूरदराज इलाकों पर भी नजर रख सकता है, जहां इंसानों का पहुंचना नामुमकिन है. - क्लाइमेट चेंज: ग्लेशियरों के खिसकने, बर्फ के पिघलने और ग्लोबल वार्मिंग के असर को समझने में यह डेटा बेहद मददगार साबित होगा. - प्राकृतिक आपदाएं: इसके अलावा, यह दुनिया भर में लैंडस्लाइड (भूस्खलन), ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं की पहले से चेतावनी देने में भी सक्षम है. नासा और इसरो का मेल NISAR दुनिया का सबसे शक्तिशाली ‘अर्थ ऑब्जर्वेशन’ (पृथ्वी की निगरानी करने वाला) सैटेलाइट है. यह पहला ऐसा सैटेलाइट है जो दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी (L-बैंड और S-बैंड) वाले रडार का एक साथ इस्तेमाल करता है. L-बैंड: इसे नासा की ‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’ (JPL) ने तैयार किया है. S-बैंड: इसे भारत की ‘इसरो’ (ISRO) की लैब्स में बनाया गया है. इस ऐतिहासिक सैटेलाइट को भारत के श्रीहरिकोटा स्थित ‘सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र’ से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था, और अब यह अंतरिक्ष से पृथ्वी की हर छोटी-बड़ी हलचल पर अपनी पैनी नजर रखे हुए है.
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