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Jagannath Rath Yatra : पहले चढ़ाया गया अधर पना, फिर तोड़े गए घड़े; भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में निभाई गई सदियों पुरानी रस्म - dainiktribuneonline.com

Jagannath Rath Yatra : पहले चढ़ाया गया अधर पना, फिर तोड़े गए घड़े; भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में निभाई गई सदियों पुरानी रस्म - dainiktribuneonline.com

Jagannath Rath Yatra : ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के समक्ष रविवार को हजार श्रद्धालु रथ यात्रा के तहत 'अधर पना' अनुष्ठान के साक्षी बने। इस अनुष्ठान के तहत मंदिर के समक्ष भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को मीठा पेय चढ़ाया जाता है....

Jagannath Rath Yatra : ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के समक्ष रविवार को हजार श्रद्धालु रथ यात्रा के तहत 'अधर पना' अनुष्ठान के साक्षी बने। इस अनुष्ठान के तहत मंदिर के समक्ष भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को मीठा पेय चढ़ाया जाता है। मिट्टी के बर्तनों में रखे मीठे पेय को रथों पर विराजमान देवी-देवताओं को अर्पित करने के बाद उन बर्तनों को फोड़ दिया जाता है। यह पेय रथ के फर्श पर बहता है और उन सहायक देवी-देवताओं और आत्माओं को मिलता है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे वार्षिक रथ यात्रा के दौरान तीनों देवताओं के साथ चलते हैं।पूर्व पुरी रियासत के राजा गजपति महाराजा दिब्यसिंह देब ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि भगवान जगन्नाथ, जैसा कि उनके नाम से ही पता चलता है, सिर्फ इंसानों के भगवान नहीं हैं। उन्होंने बताया, ''वे जानवरों, पक्षियों, पेड़-पौधों और जीवित व शरीर-रहित आत्माओं सभी के स्वामी हैं। वैसे तो इंसानों को साल भर उनका 'महाप्रसाद' मिलता रहता है, लेकिन रथ यात्रा के दौरान ही एक ऐसा मौका आता है जब अदृश्य आत्माओं की प्यास भी 'अधर पना' नाम के मीठे पेय से बुझती है।''यह रस्म तीनों रथों नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ), तालध्वज (भगवान बलभद्र) और दर्पदलन (देवी सुभद्रा) पर 'सुना बेश' (सुनहरे वस्त्र) के बाद और आषाढ़ शुक्ल पक्ष के 12वें दिन की जाती है। श्री जगन्नाथ संस्कृति के शोधकर्ता डॉ. भास्कर मिश्रा ने बताया कि यह रस्म मंदिर के बाहर की जाती है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, अदृश्य आत्माएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, भले ही उनके पास शरीर न हो। उन्होंने बताया कि रविवार को 'अधर पान' रस्म निभाई गई, जिसमें भाई-बहन देवताओं को मीठे पानी से भरे घड़े चढ़ाए गए।क्या होता है अधर पना?मिश्र ने बताया, ''इसका नाम 'अधर पना' इसलिए है क्योंकि मिट्टी के बड़े घड़े भाई-बहन देवताओं के 'अधर' (होंठों) को छूते हैं। 'पान' का मतलब मीठा पेय होता है।'' उन्होंने कहा कि बाद में रथ पर घड़े फोड़े गए और मीठा पेय रथ के फर्श पर फैल गया।उन्होंने बताया कि परंपरा के अनुसार, 'छावनी मठ' के पास स्थित एक कुएं से पानी लाया जाता है। इसके बाद दूध की मलाई, पनीर, चीनी, केला, कपूर, जायफल, काली मिर्च और अन्य मसालों का इस्तेमाल करके 'पना' तैयार किया जाता है और देवताओं को अर्पित किया जाता है। मीठे पानी से भरे मिट्टी के नौ घड़े-हर देवता के लिए तीन-उनके होंठों से सटाकर रखे जाते हैं।'अधर पना' रस्म के बाद, देव विग्रह अपने रथों पर ही विराजमान रहते हैं और 27 जुलाई को 'नीलाद्रि बिजे' नाम की एक खास रस्म के जरिए उन्हें मुख्य मंदिर के गर्भगृह में ले जाया जाएगा, जिससे भगवान जगन्नाथ की सालाना रथ यात्रा संपन्न होगी। 'अधर पना' रस्म के लिए भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए, पुलिस ने जगन्नाथ मंदिर के 'सिंह द्वार' के पास 'बड़ा डंडा'(रथ यात्रा मार्ग) पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे।

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