कोणार्क ही नहीं... MP के इस मंदिर पर भी पड़ती है सूर्य की पहली किरण! 300 साल पुराने नवग्रह मंदिर का अनोखा रहस्य

Khargone Navagrah Temple: सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश के साथ दक्षिणायन शुरू होने पर सूर्योदय की पहली किरण मंदिर के विशेष मार्ग से होकर सीधे गर्भगृह में स्थित सूर्य चक्र और सूर्य देव की प्रतिमा तक पहुंचती है. इस दौरान यहां सूर्य किरण प्रवेश महोत्सव भी मनाया जाता है. यह दृश्य कुछ महीनों तक ही दिखाई देता है, इसलिए इसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
Khargone News: उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में भी एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां सूर्योदय की पहली किरण सीधे गर्भगृह में विराजमान सूर्य देव का अभिषेक करती है. हालांकि यह अद्भुत दृश्य पूरे साल नहीं, बल्कि दक्षिणायन की शुरुआत के बाद कुछ महीनों तक ही देखने को मिलता है. खगोल विज्ञान, ज्योतिष और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का यह दुर्लभ संगम श्रद्धालुओं को अपनी और आकर्षित करता है. देश के अनूठे मंदिरों में गिनती खरगोन शहर में कुंदा नदी के किनारे स्थित सूर्य प्रधान नवग्रह मंदिर करीब 300 वर्ष पुराना माना जाता है. मंदिर की खासियत यह है कि इसकी पूरी संरचना ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों और गणितीय गणना के आधार पर तैयार की गई है. सात दिन, 12 राशियां, 12 महीने और नौ ग्रहों को ध्यान में रखकर मंदिर का निर्माण किया गया है. यही वजह है कि इसे देश के अनूठे नवग्रह मंदिरों में गिना जाता है. 20 फीट नीचे सूर्य देव का दरबार मंदिर का गर्भगृह सामान्य धरातल से करीब 20 फीट नीचे बनाया गया है, जहां सूर्य देव नौ ग्रहों के साथ विराजमान हैं. मंदिर में प्रवेश की सात सीढ़ियां सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक हैं. गर्भगृह तक पहुंचने वाली 12 सीढ़ियां 12 राशियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि बाहर निकलने की 12 सीढ़ियां साल के 12 महीनों का संकेत देती हैं. कब दिखाता अद्भुत दृश्य? आचार्य लोकेश जागीरदार ने बताया कि 16 जुलाई से सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश के साथ दक्षिणायन शुरू होने पर सूर्योदय की पहली किरण मंदिर के विशेष मार्ग से होकर सीधे गर्भगृह में स्थित सूर्य चक्र और सूर्य देव की प्रतिमा तक पहुंचती है. इस दौरान यहां सूर्य किरण प्रवेश महोत्सव भी मनाया जाता है. यह दृश्य कुछ महीनों तक ही दिखाई देता है, इसलिए इसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. 300 साल पुराना इतिहास यह मंदिर 300 से ज्यादा प्राचीन माना जाता है. शेषप्पा नमक व्यक्ति को मां बगलामुखी ने स्वप्न में दर्शन देकर इस स्थान पर नवग्रह मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया था. मंदिर के तीन शिखर त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं. पूरा मंदिर ग्रहशांति मंत्रों के आधार पर स्थापित माना जाता है. इसकी वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है. गर्भगृह में सूर्य देव मध्य में विराजमान हैं, जबकि सामने शनि, दाईं ओर गुरु और बाईं ओर मंगल ग्रह स्थापित हैं. सभी ग्रह अपने-अपने वाहन, ग्रह मंडल, ग्रह यंत्र, ग्रह रत्न और अस्त्र-शस्त्र के साथ विराजमान हैं. मंदिर से जुड़ी मान्यता मंदिर में नौ ग्रहों की अधिष्ठात्री मां बगलामुखी भी विराजमान हैं, इसलिए इसे पीताम्बरी ग्रह शांति पीठ भी कहा जाता है. मान्यता है कि जिस ग्रह से संबंधित परेशानी हो, उस ग्रह से जुड़ी सामग्री की दान पोटली यहां अर्पित करने से ग्रह दोष शांत होता है और परेशानियां सा निजात मिलती है.
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