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कृपलानी से लोहिया तक... अब प्रशांत किशोर भी उपचुनाव से रचे इतिहास

कृपलानी से लोहिया तक... अब प्रशांत किशोर भी उपचुनाव से रचे इतिहास

कृपलानी से लोहिया तक... अब प्रशांत किशोर भी उपचुनाव से रचे इतिहास पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत दर्ज कर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय राजनीति के उन नेताओं की पांत में जगह बना ली है, जिन्होंने आम चुनाव में हार के बाद उपचुनाव के जरिए चुनावी वापसी की। आचार्य जेबी कृपलानी, डॉ. राममनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी और राजेश खन्ना जैसे नेताओं के बाद अब प्रशांत किशोर का नाम भी इस सूची में जुड़ गया है। बांकीपुर सीट से प्रशांत किशोर की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह सीट लंबे समय से भाजपा के प्रभाव वाली रही है। नितिन नवीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद सीट खाली हुई और यहां उपचुनाव कराया गया। नितिन नवीन इससे पहले लगातार कई चुनावों में इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। उपचुनाव से संसद पहुंच चुके हैं कई दिग्गज भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब किसी नेता ने आम चुनाव में हार के बाद उपचुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी को नई दिशा दी। आचार्य जेबी कृपलानी 1952 के आम चुनाव में फैजाबाद से हार गए थे, लेकिन 1955 में भागलपुर-पूर्णिया लोकसभा सीट के उपचुनाव में जीत दर्ज कर संसद पहुंचे। डॉ. राममनोहर लोहिया 1962 में फूलपुर से जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ चुनाव हार गए थे। इसके अगले वर्ष 1963 में उन्होंने फर्रुखाबाद लोकसभा सीट का उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी की। इसी तरह 1977 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। 1978 में उन्होंने कर्नाटक की चिकमगलूर सीट से उपचुनाव जीतकर लोकसभा में वापसी की। राजेश खन्ना भी 1991 में नई दिल्ली सीट से लालकृष्ण आडवाणी से हारने के बाद 1992 के उपचुनाव में इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचे थे। प्रशांत किशोर की जीत क्यों अहम? प्रशांत किशोर की जीत को बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी। इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने अपना जनसंपर्क अभियान जारी रखा और बांकीपुर उपचुनाव में सीधे मैदान में उतरकर जीत हासिल की। उनकी राजनीतिक रणनीति में शिक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। जन सुराज पार्टी के गठन से पहले प्रशांत किशोर ने बिहार में लंबी पदयात्रा की थी। इस दौरान उन्होंने गांव-कस्बों तक पहुंच बनाकर स्थानीय मुद्दों को समझने की कोशिश की। कमजोर विपक्ष को मिल सकता है नया आधार बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत को बिहार में विपक्ष के लिए भी अहम माना जा रहा है। राज्य की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल और अन्य विपक्षी दलों के सामने कई चुनौतियां हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर का विधानसभा में प्रवेश विपक्ष की राजनीति को नया मुद्दा और नया चेहरा दे सकता है। उनकी जीत सत्तारूढ़ भाजपा के लिए भी राजनीतिक संदेश मानी जा रही है। खासकर भाजपा की मजबूत मानी जाने वाली सीट पर जीत ने यह संकेत दिया है कि स्थानीय मुद्दों और प्रभावी जनसंपर्क के आधार पर राजनीतिक समीकरण बदले जा सकते हैं। दतिया में कांग्रेस की जीत, मांजलपुर में भाजपा बरकरार उपचुनाव के नतीजों में मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जबकि गुजरात की मांजलपुर सीट भाजपा के खाते में गई। दतिया में टिकट को लेकर भाजपा के भीतर असंतोष की चर्चा भी रही। वहीं, मांजलपुर में भाजपा अपनी स्थिति कायम रखने में सफल रही। बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत इन उपचुनावों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश मानी जा रही है। आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह परिणाम बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की संभावनाओं को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

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