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परमाणु प्रसार

परमाणु प्रसार

पश्चिम एशिया में जारी घातक युद्ध के बीच वहां हो रहा एक परमाणु समझौता बहुत व्यापक महत्व रखता है। अगर अचानक कोई बदलाव न हुआ, तो अमेरिका और सऊदी अरब के बीच असैन्य परमाणु समझौता लागू हो जाएगा...

पश्चिम एशिया में जारी घातक युद्ध के बीच वहां हो रहा एक परमाणु समझौता बहुत व्यापक महत्व रखता है। अगर अचानक कोई बदलाव न हुआ, तो अमेरिका और सऊदी अरब के बीच असैन्य परमाणु समझौता लागू हो जाएगा। सऊदी अरब वर्षों से परमाणु शक्ति बनने के लिए लालायित है। उसका सबसे निकटतम सहयोगी अमेरिका भी इजरायल के मोह में यह नहीं चाहता था कि रणनीतिक रूप से काफी संवेदनशील सऊदी अरब परमाणु शक्ति अर्जित कर ले। ध्यान रहे, यह समझौता परमाणु बम बनाने के लिए नहीं, परमाणु ऊर्जा के लिए हो रहा है। भारत सहित करीब 26 देशों के साथ अमेरिका समझौता कर चुका है। यह नागरिक परमाणु समझौता ऐसा तरीका है, जो विश्व स्तर पर शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा पर सहयोग की अनुमति देता है। अमेरिका अब सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण, परमाणु ईंधन आपूर्ति, रिएक्टर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, परमाणु सुरक्षा मानक, वैज्ञानिक-इंजीनियर प्रशिक्षण और रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन के लिए काम करेगा। सवाल पूछा जा सकता है कि सऊदी अरब के पास तेल-ऊर्जा की कोई कमी नहीं है, तो वह परमाणु ऊर्जा के लिए क्यों लालायित है?गौर कीजिए, दुनिया में परमाणु ऊर्जा का अपना आकर्षण है और हर देश इस ऊर्जा का लाभ लेने के लिए लालायित है। दुनिया की परमाणु महाशक्तियों ने लंबे समय तक यह सुनिश्चित किया है कि उनकी वैज्ञानिक तरक्की दूसरे देशों के पास न पहुंच पाए। फिर भी, अब एक ऐसा दौर आ गया है, जब बड़े देश परस्पर स्वार्थ की वजह से परमाणु समझौते करने लगे हैं। कुछ समझौते खुले रूप से हुए हैं, जबकि अनेक समझौते गोपनीय हैं। नतीजतन, दुनिया में करीब 31 देश परमाणु ऊर्जा पैदा करते हैं, जबकि करीब नौ देशों के पास परमाणु बम हैं। एक दौर था, जब दुनिया में परमाणु विरोधी माहौल था। कई देश स्वेच्छा से परमाणु शक्ति बनने से इनकार कर रहे थे। अब वक्त बदला है। छोटे देशों को भी पता चल गया है कि परमाणु ऊर्जा होने से सामरिक और रणनीतिक ताकत बढ़ती है। क्या सऊदी अरब और मजबूत होने जा रहा है? क्या इससे पश्चिम एशिया में स्थिरता और युद्ध-विराम को बल मिलेगा? क्या इससे परमाणु शक्ति बनने के लिए लालायित ईरान में नाराजगी नहीं फैलेगी? यह सवाल पश्चिम एशिया में उठेगा कि किसी देश को परमाणु संपन्न करना और किसी देश को वंचित रखने की रणनीति कितनी तार्किक या जायज है?दरअसल, सऊदी अरब के साथ खड़े होना अमेरिका की मजबूरी है। इधर के वर्षों में सऊदी अरब से रूस और चीन की निकटता लगातार बढ़ी है। परमाणु मोर्चे पर अगर सऊदी की मदद अमेरिका नहीं करेगा, तो रूस या चीन मदद के लिए आगे आ जाएंगे। दूसरी ओर, हमारे लिए यह गौर करने की बात है, पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ सितंबर 2025 में एक रणनीतिक रक्षा समझौता किया है, जिसके तहत सऊदी अरब परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकता है। अत: भारत के लिए तुलनात्मक रूप से यही अच्छा है कि अमेरिका सऊदी अरब के सहयोग में खड़ा हो। आगामी 30 वर्ष के लिए हो रहे इस खास समझौते से परे आशंकाएं भी बड़ी हैं, जिन पर जरूर गौर करना चाहिए। अगर भविष्य में ईरान ने परमाणु बम विकसित कर लिए, तब सऊदी अरब को रोकना मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा, यह समझौता इजरायल को कतई अच्छा नहीं लगा होगा। ऐसे में, देखने वाली बात होगी कि अमेरिका इस समझौते को किस मुकाम पर पहुंचाता है।

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