संदीप भूतोड़िया की आवाज में गूंजेगी बंगाल की महालया:‘महिषासुर मर्दिनी की गाथा’ हुई जारी, शुभा मुद्गल के गीतों पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तैयार की हिंदी पटकथा
बंगाल में महालया की सुबह रेडियो पर गूंजने वाली ‘महिषासुर मर्दिनी’ की परंपरा अब हिंदी में देश-दुनिया के श्रोताओं तक पहुंचेगी। सांस्कृतिक व्यक्तित्व और राजस्थान फोरम के संस्थापक संदीप भूतोड़िया ने देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय की पौराणिक गाथा को अपनी आवाज दी है। ‘महालया: द स्टोरी ऑफ दुर्गा’ नाम से तैयार इस विशेष ऑडियो प्रस्तुति में भूतोड़िया के कथावाचन के साथ प्रख्यात गायिका शुभा मुद्गल के गीत शामिल हैं। संगीतकार जोड़ी सौरेन्द्र-सौम्योजित की परिकल्पना और पहल पर तैयार यह प्रस्तुति उनके यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य बंगाल की उस सांस्कृतिक परंपरा को हिंदी के माध्यम से व्यापक श्रोता वर्ग तक पहुंचाना है, जो पीढ़ियों से वहां के लोगों की स्मृतियों का हिस्सा रही है। खास बात यह है कि इस प्रस्तुति के जरिए उन बच्चों और युवाओं को भी महिषासुर मर्दिनी की कथा से जुड़ने का अवसर मिलेगा, जो बंगाली भाषा नहीं जानते, लेकिन भारतीय संस्कृति और देवी दुर्गा की कथा में रुचि रखते हैं। महालया की सुबह चार बजे रेडियो सुनने की परंपरा से जुड़ी है प्रस्तुति बंगाल में महालया की सुबह का विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। कई पीढ़ियों से लोग इस दिन सुबह करीब चार बजे रेडियो पर महिषासुर मर्दिनी का प्रसारण सुनते आए हैं। देवी दुर्गा के आह्वान, मंत्रोच्चार, संगीत और कथावाचन से सजी यह प्रस्तुति बंगाली परिवारों की सामूहिक स्मृतियों का हिस्सा बन चुकी है। बंगाल में जन्मे और पले-बढ़े संदीप भूतोड़िया के लिए भी यह परंपरा बचपन की यादों से जुड़ी है। लंबे समय से उनकी इच्छा थी कि महिषासुर मर्दिनी की इस विरासत को बंगाली भाषी समुदाय से आगे बढ़ाकर हिंदी भाषी श्रोताओं और विदेशों में रहने वाले भारतीयों तक पहुंचाया जाए। ‘महालया: द स्टोरी ऑफ दुर्गा’ इसी सोच का परिणाम है। भूतोड़िया ने बताया कि महालया केवल बंगाल का रेडियो प्रसारण नहीं, बल्कि एक ऐसी भावनात्मक स्मृति है, जो पीढ़ियों को जोड़ती है। हिंदी में इसकी प्रस्तुति के जरिए वे चाहते हैं कि दिल्ली, दुबई या लंदन में रहने वाले लोग भी उस भाव को महसूस कर सकें, जो बंगाल में महालया की सुबह सुनाई देने वाली इस गाथा से जुड़ा है। शुभा मुद्गल के गीत और चंद्रप्रकाश द्विवेदी की हिंदी पटकथा इस ऑडियो प्रोडक्शन की हिंदी पटकथा प्रख्यात अभिनेता एवं निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तैयार की है। प्रस्तुति श्री बाणी कुमार, पंकज कुमार मल्लिक और बीरेंद्र कृष्ण भद्र की मूल रचनाओं पर आधारित है। इसमें संदीप भूतोड़िया का कथावाचन पौराणिक कथा के विभिन्न प्रसंगों को सामने लाता है, जबकि शुभा मुद्गल अपने गायन के माध्यम से कथा के भावों को विस्तार देती हैं। प्रस्तुति में संस्कृत और हिंदी का समन्वय किया गया है। पारंपरिक मंत्रोच्चार, कथावाचन और संगीत के जरिए देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि इसका आध्यात्मिक भाव बरकरार रहे और नई पीढ़ी के श्रोता भी इसे आसानी से समझ सकें। पारंपरिक मंत्रोच्चार के साथ समकालीन संगीत का संयोजन सौरेन्द्र-सौम्योजित की परिकल्पना पर तैयार इस प्रस्तुति में पारंपरिक मंत्रोच्चार को सिम्फोनिक संगीत संयोजन और छह मौलिक संगीत रचनाओं के साथ जोड़ा गया है। इन रचनाओं को शुभा मुद्गल और सौम्योजित ने स्वर दिया है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान आचार्य तपश चक्रवर्ती ने चंडी पाठ किया है। संगीत निर्माण की जिम्मेदारी सैकत गोब्लो बिस्वास ने संभाली है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े कलाकारों का बंगाल के साथ भावनात्मक रिश्ता भी रहा है। संदीप भूतोड़िया और संगीतकार जोड़ी सौरेन्द्र-सौम्योजित का बचपन बंगाल में बीता है। वहीं, शुभा मुद्गल के माता-पिता भी महालया के इस प्रतिष्ठित प्रसारण को सुना करते थे। ऐसे में यह प्रस्तुति केवल एक संगीत परियोजना नहीं, बल्कि बचपन की यादों और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की सामूहिक पहल भी है। जयपुर और राजस्थान की सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं भूतोड़िया संदीप भूतोड़िया साहित्यिक और कलात्मक विरासत के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार के लिए लंबे समय से सक्रिय हैं। राजस्थान फोरम के संस्थापक के रूप में उन्होंने जयपुर और राजस्थान में कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी कई गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। उनकी सांस्कृतिक पहलें शहर की कलात्मक पहचान को व्यापक मंच तक पहुंचाने के प्रयासों से जुड़ी रही हैं। ‘महालया: द स्टोरी ऑफ दुर्गा’ के जरिए भूतोड़िया अब बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को भाषा और भौगोलिक सीमाओं से आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। यह ऑडियो प्रस्तुति ऐसे दौर में सामने आई है, जब दृश्य माध्यमों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद, कथावाचन, संगीत और मंत्रोच्चार के माध्यम से किसी सांस्कृतिक परंपरा को अनुभव कराने का यह तरीका ऑडियो माध्यम की अहमियत को भी रेखांकित करता है।
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