Politics·

कोलकाता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अवैध निर्माण गिराने से पहले देना होगा पर्याप्त समय

कोलकाता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अवैध निर्माण गिराने से पहले देना होगा पर्याप्त समय

कोलकाता हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण गिराने के लिए तीन दिन का नोटिस रद्द किया। अदालत ने कहा, अपील का अधिकार सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त समय देना जरूरी है।

कोलकाता: अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोलकाता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अवैध निर्माण को गिराने का आदेश दिया जाता है, तो संबंधित पक्ष को उसके खिलाफ अपील या न्यायिक चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। केवल तीन दिन की समयसीमा तय करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बिधाननगर नगर निगम द्वारा जारी तीन दिन के भीतर निर्माण ध्वस्त करने का नोटिस रद्द कर दिया। तीन दिन में निर्माण गिराने का नोटिस हाईकोर्ट ने किया रद्द यह मामला बिधाननगर नगर निगम द्वारा एक निर्माण को अवैध घोषित करने और उसे गिराने के लिए केवल तीन दिन का समय देने से जुड़ा है। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का अवैध निर्माण गिराने के आदेश को अदालत में चुनौती देने का अधिकार छीना नहीं जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी नगर निकाय ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकता, जिसमें निर्माण गिराने की समयसीमा इतनी कम हो कि प्रभावित पक्ष के लिए अदालत या अपीलीय प्राधिकरण का दरवाजा खटखटाना ही व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाए।अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की प्रक्रिया नागरिकों के वैधानिक अधिकारों को कमजोर करती है। अदालत ने कहा कि नगर निकाय अपने स्तर पर यह तय नहीं कर सकता कि अपील के लिए कितना समय पर्याप्त होगा। सिर्फ इसलिए कि निर्माण अवैध बताया गया है, संबंधित व्यक्ति के कानूनी अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। उसे कानून के तहत उपलब्ध सभी उपायों का लाभ लेने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। Read Also : स्टील प्लांट के विस्तार में बांकुड़ा पहुंचे शुभेंदु अधिकारी ने जतायी उम्मीद, कहा – लोगों को मिलेगा रोजगार 4 जुलाई को जारी हुआ था ध्वस्तीकरण आदेश बिधाननगर के नगर आयुक्त ने 4 जुलाई को कथित अवैध निर्माण को गिराने का आदेश जारी किया था और इसे केवल तीन दिनों के भीतर लागू करने का निर्देश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने अदालत में कहा कि नगर निगम ने उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया और निर्माणकर्ताओं की आपत्तियों पर भी समुचित विचार नहीं किया।उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नगर निगम अधिनियम के तहत अपील का अधिकार सुनिश्चित है, लेकिन केवल तीन दिन की समयसीमा तय कर नगर आयुक्त ने इस अधिकार को लगभग समाप्त कर दिया। नगर निगम ने अदालत में क्या कहा नगर निगम की ओर से कहा गया कि निर्माणकर्ताओं को पहले कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज नोटिस) जारी किया गया था और उन्हें कई बार सुनवाई का अवसर भी दिया गया।नगर निगम के अनुसार, 4 जुलाई की सुनवाई में संबंधित पक्ष ने निर्माण को अवैध स्वीकार करते हुए उसे नियमित (रेग्युलराइज) करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया।नगर निगम ने यह भी दलील दी कि यदि ऐसे मामलों में अपील के लिए अधिक समय दिया जाएगा तो अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई बाधित होगी और इससे ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है। मामले से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि प्रारंभिक सुनवाई का नोटिस निर्धारित समय बीत जाने के बाद संबंधित पक्ष तक पहुंचा था। हालांकि बाद में उन्हें दोबारा सुनवाई का अवसर दिया गया और वे 4 जुलाई को नगर आयुक्त के समक्ष उपस्थित भी हुए। याचिकाकर्ताओं ने नगर निगम के इस दावे का स्पष्ट रूप से खंडन किया कि उन्होंने अवैध निर्माण स्वीकार कर लिया था। ध्वस्तीकरण आदेश पर नहीं, समयसीमा पर उठाया सवाल हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसने ध्वस्तीकरण आदेश की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की है।हालांकि अदालत ने केवल तीन दिन की समयसीमा को पूरी तरह अनुचित और अव्यावहारिक माना।अदालत ने कहा कि नगर निगम कानून के तहत अपील के लिए 30 दिन का समय उपलब्ध है और प्रशासन को ऐसी समयसीमा तय करनी चाहिए जिससे प्रभावित पक्ष अपने कानूनी अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सके।

This is a summary. Read the full article at the original source.

Read full article at samachareisamay