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मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन पर, क्षेत्रीय संतुलन को लेकर सरकार पर उठे सवाल

मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन पर, क्षेत्रीय संतुलन को लेकर सरकार पर उठे सवाल

जबलपुर. प्रदेश में मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन को लेकर जबलपुर में विरोध तेज होता दिखाई दे रहा है. नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच की बैठक में शहर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के फैसले पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे क्षेत्रीय संतुलन के विपरीत बताया. बैठक में सर्वसम्मति से निंदा प्रस्ताव पारित कर सरकार से निर्णय की समीक्षा करने की मांग की गई. वक्ताओं का कहना था कि मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषय पर लिए गए निर्णय में जबलपुर के साथ न्याय नहीं हुआ है, जिससे पूरे महाकौशल क्षेत्र में असंतोष का वातावरण बन गया है. बैठक में उपस्थित सदस्यों ने कहा कि जबलपुर लंबे समय से चिकित्सा शिक्षा, सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल संस्थानों का प्रमुख केंद्र रहा है. इसके बावजूद मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन के दौरान जिलों के बंटवारे की प्रक्रिया में ऐसा संतुलन नहीं रखा गया, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी. उनका आरोप था कि अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र वाले उज्जैन को अधिक जिले सौंपे गए, जबकि जबलपुर के अधिकार क्षेत्र में कम जिले रखे गए. इससे न केवल प्रशासनिक असंतुलन पैदा होगा, बल्कि भविष्य में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर भी प्रभाव पड़ सकता है. बैठक में वक्ताओं ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय का क्षेत्राधिकार केवल भौगोलिक सीमाओं का विषय नहीं होता, बल्कि उससे जुड़े मेडिकल कॉलेजों, विद्यार्थियों, स्वास्थ्य संस्थानों और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उसका सीधा असर पड़ता है. इसलिए ऐसे निर्णय पूरी पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर होने चाहिए. उनका कहना था कि सरकार ने यदि जिलों के विभाजन का कोई स्पष्ट आधार निर्धारित किया है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों के बीच उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके. बैठक के दौरान सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. उपस्थित सदस्यों का कहना था कि जबलपुर जैसे महत्वपूर्ण शहर के हितों से जुड़े मुद्दे पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों को प्रभावी ढंग से अपनी बात सरकार के समक्ष रखनी चाहिए थी. उनका मानना था कि शहर के हितों की रक्षा के लिए अपेक्षित राजनीतिक सक्रियता दिखाई नहीं दी, जिससे लोगों में निराशा बढ़ी है. वहीं यह भी कहा गया कि कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा विरोध दर्ज कराने के बावजूद निर्णय में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिससे यह संदेश गया कि क्षेत्रीय भावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. बैठक में यह भी कहा गया कि जबलपुर की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल अंचल के शैक्षणिक और स्वास्थ्य केंद्र के रूप में रही है. ऐसे में मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन के दौरान यदि शहर की भूमिका को कमजोर किया जाता है तो इसका असर आने वाले वर्षों में चिकित्सा शिक्षा और संस्थागत विकास पर भी पड़ सकता है. वक्ताओं ने सरकार से आग्रह किया कि मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन और जिलों के निर्धारण से जुड़े सभी तथ्यों एवं मानकों को सार्वजनिक किया जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर निर्णय की पुनर्समीक्षा कर क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित किया जाए. बैठक के अंत में उपस्थित नागरिकों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि यदि इस विषय पर शासन स्तर पर सकारात्मक पहल नहीं हुई तो विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों के साथ व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा. उनका कहना था कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का मुद्दा नहीं, बल्कि जबलपुर और महाकौशल क्षेत्र की संस्थागत पहचान, विकास और भविष्य से जुड़ा विषय है. इसलिए सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे किसी भी क्षेत्र के साथ भेदभाव की भावना उत्पन्न न हो और प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके.

जबलपुर. प्रदेश में मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन को लेकर जबलपुर में विरोध तेज होता दिखाई दे रहा है. नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच की बैठक में शहर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के फैसले पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे क्षेत्रीय संतुलन के विपरीत बताया. बैठक में सर्वसम्मति से निंदा प्रस्ताव पारित कर सरकार से निर्णय की समीक्षा करने की मांग की गई. वक्ताओं का कहना था कि मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषय पर लिए गए निर्णय में जबलपुर के साथ न्याय नहीं हुआ है, जिससे पूरे महाकौशल क्षेत्र में असंतोष का वातावरण बन गया है. बैठक में उपस्थित सदस्यों ने कहा कि जबलपुर लंबे समय से चिकित्सा शिक्षा, सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल संस्थानों का प्रमुख केंद्र रहा है. इसके बावजूद मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन के दौरान जिलों के बंटवारे की प्रक्रिया में ऐसा संतुलन नहीं रखा गया, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी. उनका आरोप था कि अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र वाले उज्जैन को अधिक जिले सौंपे गए, जबकि जबलपुर के अधिकार क्षेत्र में कम जिले रखे गए. इससे न केवल प्रशासनिक असंतुलन पैदा होगा, बल्कि भविष्य में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर भी प्रभाव पड़ सकता है. बैठक में वक्ताओं ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय का क्षेत्राधिकार केवल भौगोलिक सीमाओं का विषय नहीं होता, बल्कि उससे जुड़े मेडिकल कॉलेजों, विद्यार्थियों, स्वास्थ्य संस्थानों और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उसका सीधा असर पड़ता है. इसलिए ऐसे निर्णय पूरी पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर होने चाहिए. उनका कहना था कि सरकार ने यदि जिलों के विभाजन का कोई स्पष्ट आधार निर्धारित किया है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों के बीच उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके. बैठक के दौरान सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. उपस्थित सदस्यों का कहना था कि जबलपुर जैसे महत्वपूर्ण शहर के हितों से जुड़े मुद्दे पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों को प्रभावी ढंग से अपनी बात सरकार के समक्ष रखनी चाहिए थी. उनका मानना था कि शहर के हितों की रक्षा के लिए अपेक्षित राजनीतिक सक्रियता दिखाई नहीं दी, जिससे लोगों में निराशा बढ़ी है. वहीं यह भी कहा गया कि कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा विरोध दर्ज कराने के बावजूद निर्णय में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिससे यह संदेश गया कि क्षेत्रीय भावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. बैठक में यह भी कहा गया कि जबलपुर की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल अंचल के शैक्षणिक और स्वास्थ्य केंद्र के रूप में रही है. ऐसे में मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन के दौरान यदि शहर की भूमिका को कमजोर किया जाता है तो इसका असर आने वाले वर्षों में चिकित्सा शिक्षा और संस्थागत विकास पर भी पड़ सकता है. वक्ताओं ने सरकार से आग्रह किया कि मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभाजन और जिलों के निर्धारण से जुड़े सभी तथ्यों एवं मानकों को सार्वजनिक किया जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर निर्णय की पुनर्समीक्षा कर क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित किया जाए. बैठक के अंत में उपस्थित नागरिकों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि यदि इस विषय पर शासन स्तर पर सकारात्मक पहल नहीं हुई तो विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों के साथ व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा. उनका कहना था कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का मुद्दा नहीं, बल्कि जबलपुर और महाकौशल क्षेत्र की संस्थागत पहचान, विकास और भविष्य से जुड़ा विषय है. इसलिए सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे किसी भी क्षेत्र के साथ भेदभाव की भावना उत्पन्न न हो और प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके. Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

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