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हिमाचल में सरकारी जमीन पर बसे गरीबों को मिल सकता है मालिकाना हक, बड़ी तैयारी

हिमाचल में सरकारी जमीन पर बसे गरीबों को मिल सकता है मालिकाना हक, बड़ी तैयारी

हिमाचल प्रदेश सरकार सरकारी जमीन पर वर्षों से काबिज गरीब और भूमिहीन परिवारों को मकानों का मालिकाना हक देने के लिए नई नीति बनाने पर विचार कर रही है। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट...

हिमाचल प्रदेश में वर्षों से सरकारी जमीन पर घर बनाकर रह रहे हजारों गरीब और भूमिहीन परिवारों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। ऐसे लोग, जिनके सिर पर हमेशा बेदखली का खतरा मंडराता रहा, उन्हें अब कानूनी अधिकार मिलने का रास्ता खुल सकता है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने बुधवार को अपने गृह जिला हमीरपुर में घोषणा की कि प्रदेश सरकार सरकारी भूमि पर कई वर्ष पहले बसे गरीब एवं भूमिहीन लोगों के मकानों को राहत देने के लिए नई नीति बनाने पर विचार कर रही है।मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि सरकार अतिक्रमण से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का अध्ययन कर रही है और उसी के अनुरूप फैसला लिया जाएगा। हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह बयान उस प्रक्रिया से जुड़ा माना जा रहा है, जिस पर राज्य सरकार पिछले कुछ समय से काम कर रही है।दरअसल, सरकार पहले ही सरकारी जमीन पर लंबे समय से रह रहे पात्र लोगों को राहत देने की योजना तैयार कर चुकी है। इस योजना का मसौदा तैयार होने के बाद उसे कानूनी प्रक्रिया के लिए भेजा गया और बाद में मंत्रिमंडल ने भी ड्राफ्ट को मंजूरी दी। सरकार ने इस संबंध में केंद्र सरकार को भी प्रस्ताव भेजा है।सरकार की प्रस्तावित नीति का उद्देश्य उन गरीब, भूमिहीन, लघु और सीमांत किसानों को राहत देना है, जिन्होंने वर्षों पहले सरकारी भूमि पर मकान बनाए या खेती और बागवानी शुरू की। यदि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप यह नीति लागू होती है तो बड़ी संख्या में ऐसे परिवारों को पहली बार अपनी जमीन और मकानों को लेकर कानूनी सुरक्षा मिल सकती है।प्रस्तावित नीति के अनुसार राहत केवल पात्र लोगों तक सीमित रहेगी। सरकार ने 20 बीघा से कम कुल भूमि रखने वाले भूमिहीन और सीमांत किसानों को इसके दायरे में रखने का प्रस्ताव तैयार किया है। यानी जिनके पास पहले से अधिक जमीन है, उन्हें इसका लाभ नहीं मिलेगा। सरकार का कहना है कि योजना का मकसद केवल वास्तविक जरूरतमंद परिवारों को राहत देना है।नियमितीकरण का लाभ लेने के लिए संबंधित व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह लंबे समय से उस भूमि का उपयोग कर रहा है। इसके लिए गांव के एक गवाह का समर्थन और ग्राम सभा की अनुशंसा भी जरूरी होगी। इन शर्तों के आधार पर पात्रता तय की जाएगी।जानकारी अनुसार हिमाचल प्रदेश में करीब 1.67 लाख लोगों ने सरकारी जमीन पर किसी न किसी रूप में कब्जा किया हुआ है। हालांकि इनमें से सभी लोगों को राहत नहीं मिलेगी। केवल वही लोग पात्र होंगे, जो सरकार की ओर से तय की गई शर्तों को पूरा करेंगे।सरकारी और वन भूमि पर अतिक्रमण का मामला पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इसी वजह से सरकार इस बार ऐसी नीति तैयार करना चाहती है, जो न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हो और भविष्य में कानूनी चुनौती का सामना कर सके।यदि सरकार इस नीति को अंतिम रूप देने और लागू कराने में सफल रहती है तो इसका लाभ बड़ी संख्या में गरीब और भूमिहीन परिवारों तक पहुंच सकता है। वर्षों से अनिश्चितता में जीवन गुजार रहे लोगों के लिए यह बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।राजनीतिक दृष्टि से भी इस पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप यह प्रस्ताव सिरे चढ़ता है तो अगले साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह सुक्खू सरकार का बड़ा दांव माना जाएगा।सत्तारूढ़ कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को भी घेरने की कोशिश कर सकती है। पार्टी यह तर्क दे सकती है कि भाजपा अपने शासनकाल में ऐसी व्यवस्था लागू नहीं कर सकी, जबकि मौजूदा सरकार ने इस दिशा में पहल की है। हालांकि अंतिम तस्वीर तभी साफ होगी, जब कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकार इस नीति को औपचारिक रूप से लागू करेगी।रिपोर्ट- यूके शर्मा

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