ईरान में अब भी फांसी पर चढ़ाई जा रहीं महिलाएं

ईरान में आम नागरिकों का कत्लेआम जारी है। यह बहुत ही हैरान करने वाला तथ्य है कि जहां ईरान एक तरफ बाहरी दुश्मन अमेरिका से लड़ रहा है तो वहीं वह अपने ही नागरिकों पर भी हमला कर रहा है। यह बहुत ही घातक है। ईरान में महिलाओं को भी बिना किसी हिचक के फांसी [...]
ईरान में आम नागरिकों का कत्लेआम जारी है। यह बहुत ही हैरान करने वाला तथ्य है कि जहां ईरान एक तरफ बाहरी दुश्मन अमेरिका से लड़ रहा है तो वहीं वह अपने ही नागरिकों पर भी हमला कर रहा है। यह बहुत ही घातक है। ईरान में महिलाओं को भी बिना किसी हिचक के फांसी तक दी जा रही है। इनके लिए कारण कुछ और बताए जा रहे हैं, मगर मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इन महिलाओं को हिजाब न पहनने के कारण ही सजाएं दी गई हैं। जुलाई 2026 में ईरान में कई महिलाओं को सजा सुनाई गई। कई महिलाओं को अकेले मे बंद किया गया और उनकी ज़िंदगी खतरे में है। जुलाई 2026 में ईरान में आज़म गरामी (58 वर्ष, यासुज जेल), परवीन चारदौली (39 वर्ष, ग़ज़ल हेसर जेल) और सेतायेश मोहम्मदपूर (52 वर्ष, शिराज़ की अडेलाबाद जेल) को फांसी दे दी गई। इन्हें पहले से ही सालिटेरी कन्फाइन्मन्ट में रखा गया था। जहां सोशल मीडिया पर यह कहा जा रहा है कि इन्हें अकेले में रखा गया है तो वहीं मानवाधिकार संगठनो का कहना है कि इन्हें फांसी दे दी गई है। दरअसल ईरान में महिला कैदियों और उनकी सजा को लेकर इतनी गोपनीयता और मीडिया पर प्रतिबंध है कि असली खबरें बहुत देर में सामने आती हैं। इन महिलाओं के मामले भी ऐसे ही हैं। कहा जा रहा है कि इन्हें फ़साद फ़िल-अर्ज़” (corruption on Earth) के आरोप में फांसी दी गई है। दरअसल यही वह आरोप है, जिनका इस्तेमाल सरकार द्वारा राजनीतिक असहमतियों को दबाने के लिए किया जाता है। मगर मानवाधिकार संगठनों का यह साफ कहना है कि यह फांसी किसी भी अन्य कारण से नहीं बल्कि इन्हें हिजाब न पहनने और “Women, Life, Freedom” आंदोलन में भाग लेने के कारण निशाना बनाया गया था। कानूनी मदद न मिलने का आरोप यह भी कहा जा रहा है कि इन महिलाओं को किसी भी तरह की कोई कानूनी मदद नहीं मिली थी। जो भी मुकदमे चले, वह बहुत ही कम अवधि के थे। अर्थात जल्दी ही सुनवाई खत्म हुई और जैसे कि जज यह निश्चित करके बैठे थे कि वे सजा क्या देंगे। और इन महिलाओं के पास कोई भी वकील भी नही था। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का यह मानना है कि इन महिलाओं की फांसी का आधार केवल राजनीतिक और सामाजिक असहमति थी। वहीं UN की Fact-Finding Mission on Iran ने भी यह बताया कि महिलाओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है और यह महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ संरचनागत भेदभाव का उदाहरण है। कई और लोगों की सजा के केस सोशल मीडिया पर एक्स पर कई और ईरानी नागरिकों के मामले वायरल हो रहे हैं, जिन्हें जनवरी में हिरासत में लिया गया था और अब उन्हें फांसी दी जा रही है। ऐसे ही एक युवक मेहदी जरीफ़ का मामला है। जिसे फांसी दी जानी है और उसके परिवार को अंतिम विदा के लिए भी बुला लिया गया था। एक और युवक मेहदी खनकी का भी मामला सोशल मीडिया पर है कि इस 26 वर्षीय युवक को फरवरी में हिरासत में लिया गया था और 22 जुलाई 2026 को फांसी पर लटका दिया गया। एक 19 वर्षीय अली दशती का मामला है। उसे भी सजा सुनाई जा चुकी है। सोशल मीडिया की एक पोस्ट के अनुसार इसफहन में अली दशती को फांसी पर लटकाने का खतरा है। 20 साल के आर्टिन सलरी को भी अल्लाह के दुश्मन के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और वह अभी भी जेल में है। 15 और 17 जुलाई को पाँच ऐसे ही लोगों को फांसी दे दी गई थी, जो अलग अलग जेलों से थे। अकबर शेखमिरी (खोर्रमबाद जेल), फ़र्दौस मेमारी (47 साल, रश्त), शाहीन सदर (37 साल, सारी जेल), सईद अरमांड (35 साल, सारी जेल), करीम मिर्ज़ाई (अलीगुदर्ज़ जेल)। जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद अली रहीमि रिगी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। जानकारी के अनुसार, लोर्डेगन जेल में बंद किए जाने से पहले उन्हें सबसे पहले शहरकोर्ड में इंटेलिजेंस मिनिस्ट्री के डिटेंशन सेंटर में भेजा गया था। उनकी कानूनी फाइल के अनुसार, उन पर कई आरोप हैं, जिनमें “अल्लाह के खिलाफ दुश्मनी” (मोहारेबेह), “धरती पर भ्रष्टाचार,” हथियार और गोला-बारूद रखना और ले जाना, तोड़-फोड़, गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होना, सरकार के खिलाफ प्रोपेगैंडा, राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ साजिश, डराने-धमकाने के लिए हथियारों का इस्तेमाल और सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डालना शामिल है। रहीमी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही अभी भी चल रही है। 16 साल की डायना की कहानी 16 वर्षीय किशोरी डायना की भी कहानी वायरल है। कहा जा रहा है कि उसे भी मौत की सजा सुनाई गई है। डायना को 25 जनवरी को उसके अपने घर से उसके घरवालों की मौजूदगी में उठा लिया गया था। और तभी से वह कैद में है। कहा जा रहा है कि उससे जबरन कन्फेशन पर दस्तखत कराए गए हैं। हालांकि इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है। उसके मामले की गंभीरता को देखते हुए उसके मामले को तेहरान में भेज दिया गया था। जहां एक तरफ ईरान की तारीफ इस बात को लेकर एक वर्ग द्वारा की जा रही है कि वह अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेक रहा है तो वहीं यह बात कोई नहीं उठा रहा है कि ईरान कैसे अपने ही देश के उन नागरिकों को मौत की सजा लगातार देता जा रहा है, जिन्होंने केवल अपनी बात कहने का दुस्साहस किया था। ईरान की तारीफ करने वालों के कैमरे इन युवाओं और किशोरों की तरफ क्यों नहीं मुड़ते हैं, सवाल एक यह भी है।
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