पैक्ड कमोडिटीज की जांच से जुड़ी पूर्व-शर्तें अनिवार्य, निर्माता और रिटेलर की सुरक्षा के लिए जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिडिलाइट के खिलाफ कार्रवाई रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘एम-सील फटाफट’ के पैकेट में कम वजन होने के आरोपों को लेकर पिडिलाइट इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ लीगल मेट्रोलॉजी विभाग द्वारा शुरू की गई दंडात्मक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। लखनऊ पीठ के जस्टिस आलोक माथुर की एकल पीठ ने निर्णय दिया कि पैक्ड सामानों (पैकेज्ड कमोडिटीज) के निरीक्षण से जुड़े [...]
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘एम-सील फटाफट’ के पैकेट में कम वजन होने के आरोपों को लेकर पिडिलाइट इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ लीगल मेट्रोलॉजी विभाग द्वारा शुरू की गई दंडात्मक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। लखनऊ पीठ के जस्टिस आलोक माथुर की एकल पीठ ने निर्णय दिया कि पैक्ड सामानों (पैकेज्ड कमोडिटीज) के निरीक्षण से जुड़े कानूनी नियम अनिवार्य सुरक्षा कवच हैं, जो निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं (रिटेलर्स) को मनमानी कार्रवाई से बचाते हैं। हाईकोर्ट ने विभाग द्वारा वर्ष 2013 और 2014 में जारी किए गए नोटिसों, अस्वीकृति आदेशों और अपीलीय आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि राज्य के अधिकारियों ने जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की और अपीलीय प्राधिकारी का फैसला पूरी तरह से विवेक का इस्तेमाल किए बिना लिया गया था। मामले की पृष्ठभूमि याचिकाकर्ता पिडिलाइट इंडस्ट्रीज लिमिटेड ‘एम-सील फटाफट’ नाम से एक प्रसिद्ध एडहेसिव (चिपकाने वाला पदार्थ) बनाती है। इस उत्पाद में दो भाग होते हैं – रेजिन बेस और हार्डनर, जिन्हें एक ही मुख्य पैकेट में बराबर मात्रा में रखकर बेचा जाता है। यह बाजार में 12 ग्राम, 15 ग्राम, 25 ग्राम और 1 किलोग्राम जैसे विभिन्न आकारों में उपलब्ध है। इसके 25 ग्राम वाले एक मानक खुदरा पैकेट में अंदर दो अलग-अलग पैकेट होते हैं, जिसमें 12.5 ग्राम रेजिन बेस और 12.5 ग्राम हार्डनर होता है। यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब लीगल मेट्रोलॉजी विभाग, झांसी के सीनियर इंस्पेक्टर ने झांसी के सीपरी बाजार स्थित एक रिटेल दुकान ‘मेसर्स अभिलाष आयरन स्टोर’ का निरीक्षण किया। यह निरीक्षण दुकान के मालिक शिवपाल दास की उपस्थिति में किया गया था। निर्णय में निरीक्षण की तिथि को एक जगह 6 अगस्त 2023 और विभाग की वास्तविक निरीक्षण रिपोर्ट में 6 अगस्त 2013 दर्ज किया गया है। निरीक्षण के दौरान इंस्पेक्टर ने ‘एम-सील फटाफट’ के 25 ग्राम वाले पैकेट (अधिकतम खुदरा मूल्य 10 रुपये, निर्माण तिथि अप्रैल 2013) की जांच की। इंस्पेक्टर ने आरोप लगाया कि पैकेट के अंदर रेजिन बेस का वजन शून्य था, जो कि लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 के नियम 18(2) और लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 का उल्लंघन है। पिडिलाइट को 14 अगस्त 2013 को इस संबंध में नोटिस भेजा गया। कंपनी ने औपचारिक जवाब देकर आरोपों से इनकार किया और कहा कि इंस्पेक्टर ने 2011 के नियमों के नियम 21 में निर्धारित अनिवार्य निरीक्षण प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। हालांकि, 18 जनवरी 2014 को विभाग ने कंपनी के जवाब को खारिज कर दिया और कहा कि कानूनी कार्यवाही रिटेलर के बजाय सीधे निर्माता के खिलाफ की जाएगी। इसके खिलाफ पिडिलाइट ने एक्ट की धारा 50(1)(d) के तहत अपील दायर की, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने 29 मई 2014 को खारिज कर दिया। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पक्षों की दलीलें याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट गौरव मेहरोत्रा और एडवोकेट श्रेया अग्रवाल ने तर्क दिया कि लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 में उत्पादों के निरीक्षण के लिए बेहद स्पष्ट और कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। उन्होंने दलील दी कि जहां नियम 19 निर्माता या पैकर के परिसर में निरीक्षण की प्रक्रिया बताता है, वहीं नियम 21 स्पष्ट रूप से खुदरा या थोक विक्रेता के परिसर में निरीक्षण के नियम तय करता है। वकील ने दलील दी कि किसी रिटेल दुकान का निरीक्षण केवल तभी किया जा सकता है जब नियम में दी गई पूर्व-शर्तें पूरी होती हों, लेकिन इस मामले में ऐसी किसी भी शर्त का पालन नहीं किया गया। इसलिए पूरी कार्यवाही कानूनन अमान्य है। वहीं दूसरी ओर, राज्य के स्टैंडिंग काउंसिल ने विभाग की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने कहा कि चूंकि रिटेल स्तर पर कम वजन का पैकेट मिला था, इसलिए विभाग को सीधे निर्माता के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार था। हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने नियमों का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि नियम 19 और नियम 21 के तहत निरीक्षण के अलग-अलग दायरे तय हैं। नियम 19 के तहत अधिकारी निर्माता के ठिकाने पर नमूने लेकर उनकी जांच कर सकते हैं, जिसके लिए एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना और हस्ताक्षर लेना अनिवार्य होता है। इसके विपरीत, नियम 21 किसी वितरक या रिटेलर की दुकान पर निरीक्षण को नियंत्रित करता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी खुदरा दुकान पर निरीक्षण केवल तीन विशिष्ट परिस्थितियों में ही किया जा सकता है: - जब अधिकृत अधिकारी को पहले से कोई शिकायत मिली हो। - अधिकारी के पास यह संदेह करने का कोई वास्तविक कारण हो कि पैकेट के साथ छेड़छाड़ की गई है, या उसमें से सामान निकाला गया है या रिसाव हुआ है। - पैकेट या उसके लेबल पर नियमों के तहत जरूरी घोषणाएं न लिखी हों। इस मामले के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि विभाग यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि इनमें से कोई भी पूर्व-शर्त पूरी हुई थी। न तो उत्पाद के खिलाफ पहले से कोई शिकायत दर्ज थी, न ही छेड़छाड़ या रिसाव का कोई सबूत था। इन नियमों के तहत दी गई सुरक्षा पर जोर देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “नियम 2011 के नियम 19 और 21 में दी गई पूर्व-शर्तें अनिवार्य प्रकृति की हैं और इन्हें निर्माता और खुदरा विक्रेता की सुरक्षा करने तथा यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है कि कार्रवाई केवल उन्हीं व्यक्तियों के खिलाफ की जाए जो लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के प्रावधानों के उल्लंघन के दोषी हैं।” कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि किसी इंस्पेक्टर को खुदरा दुकान पर कम वजन का उत्पाद मिलता है, तो उसकी सही कानूनी प्रक्रिया यह है कि वह इस मामले की रिपोर्ट लीगल मेट्रोलॉजी विभाग के निदेशक (डायरेक्टर) को भेजे। नियम 21 के तहत निदेशक द्वारा जांच किए जाने के बाद ही सामान को जब्त किया जा सकता है या निर्माता के खिलाफ कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं। इसके अलावा, कोर्ट ने विभाग के मामले में गंभीर तथ्यात्मक कमियों की ओर इशारा किया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे पता चले कि अधिकारी ने पैकेट को किस प्रकार तोला, न ही इंस्पेक्टर के साथ कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था। इसके अलावा, पिडिलाइट के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले दुकान के मालिक शिवपाल दास का कोई बयान भी दर्ज नहीं किया गया था। 29 मई 2014 के अपीलीय आदेश की आलोचना करते हुए कोर्ट ने माना कि अपीलीय प्राधिकारी ने अपने विवेक का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया था। कोर्ट ने कहा: “इसके अलावा, अपीलीय आदेश के अवलोकन से पता चलता है कि यह पूरी तरह से विवेक का इस्तेमाल न करने (नॉन-एप्लीकेशन ऑफ माइंड) के दोष से ग्रसित है।” अदालत ने अपीलीय निकायों के प्रशासनिक कर्तव्यों को याद दिलाते हुए कहा: “जब भी कोई अपील दायर की जाती है, तो अपीलीय प्राधिकारी का यह कर्तव्य होता है कि वह आरोपी द्वारा उठाए गए आधारों पर विचार करे, उन पर चर्चा करे और पर्याप्त कारणों के साथ अपील को स्वीकार या खारिज करने का निर्णय दे।” इस मामले में अपीलीय अधिकारी द्वारा बिना किसी ठोस कारण के अपील को खारिज किए जाने पर तीखी टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा: “वर्तमान मामले में, केवल रस्मी तौर पर भी औपचारिकता पूरी नहीं की गई है, क्योंकि अपीलीय प्राधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता के मामले को खारिज करने के लिए कोई कारण नहीं बताया गया है, इसलिए अपीलीय आदेश स्पष्ट रूप से अवैध, मनमाना और बिना किसी विवेक के इस्तेमाल के पारित किया गया है।” कोर्ट का निर्णय यह निष्कर्ष निकालते हुए कि लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट और उसके नियमों के अनिवार्य प्रावधानों की पूरी तरह से अनदेखी की गई थी, हाईकोर्ट ने पिडिलाइट की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने 14 अगस्त 2013 के नोटिस, 18 जनवरी 2014 के अस्वीकृति आदेश और 29 मई 2014 के अपीलीय आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया। मामले का विवरण मामले का शीर्षक: पिडिलाइट इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य वाद संख्या: रिट-सी संख्या 1005667/2014 पीठ: जस्टिस आलोक माथुर निर्णय की तिथि: 10 जुलाई, 2026
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