मां के लिए नहीं एक सुरक्षित कोना

नगर निगम विकास भवन कलेक्ट्रेट कचहरी एसआरएन और बेली अस्पताल में अलग ब्रेस्टफीडिंग रूम नहीं
प्रयागराज (ब्यूराे)। स्मार्ट सिटी और महिला सुरक्षा के दावों के बीच प्रयागराज में छोटे बच्चों की माताओं के लिए एक बुनियादी सुविधा अब भी नदारद है। नगर निगम, विकास भवन, कलेक्ट्रेट, कचहरी, एसआरएन और बेली अस्पताल जैसे प्रमुख सरकारी परिसरों में महिलाओं के लिए अलग ब्रेस्टफीडिंग रूम या मदर केयर स्पेस नहीं है। ऐसे में रोज सरकारी काम या इलाज के लिए आने वाली महिलाओं को बच्चे को दूध पिलाने के लिए कभी खाली कोना, कभी सीढ़ियां तो कभी कम भीड़ वाली जगह तलाशनी पड़ती है। इससे मां की असहजता के साथ बच्चे के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। सरकारी दफ्तरों में मां के लिए नहीं कोई सुरक्षित जगह नगर निगम, विकास भवन, कलेक्ट्रेट और कचहरी जैसे सरकारी परिसरों में रोज बड़ी संख्या में महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ विभिन्न कार्यों के लिए पहुंचती हैं। जन्म प्रमाण पत्र, पेंशन, राजस्व, सामाजिक योजनाओं, दस्तावेज सत्यापन और अन्य सरकारी कामों में कई घंटे लग जाते हैं। इस दौरान यदि बच्चे को भूख लग जाए तो मां के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसे ब्रेस्ट फीडिंग कराने की होती है। अधिकांश परिसरों में महिलाओं के लिए अलग मदर केयर रूम या ब्रेस्टफीडिंग स्पेस उपलब्ध नहीं है। मजबूरी में महिलाएं खाली बरामदा, सीढ़ी, कम भीड़ वाला कोना या वाहन पार्किंग के आसपास जगह तलाशती हैं। इससे उन्हें असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है और कई बार काम छोड़कर बाहर जाना पड़ता है। अस्पताल पहुंचे तो इलाज मिला, लेकिन प्राइवेसी नहीं स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल और बेली अस्पताल में हर दिन बड़ी संख्या में महिलाएं बच्चों के इलाज और अपने उपचार के लिए पहुंचती हैं। ओपीडी, जांच और दवा वितरण में कई घंटे इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान नवजात और छोटे बच्चों को समय-समय पर दूध पिलाना जरूरी होता है। अस्पतालों में महिला वार्ड होने के बावजूद सार्वजनिक ओपीडी, प्रतीक्षालय और जांच क्षेत्रों के पास अलग ब्रेस्टफीडिंग रूम नहीं होने से महिलाओं को परेशानी उठानी पड़ती है। कई बार भीड़भाड़ वाले कॉरिडोर या कुर्सी के किनारे बैठकर ही बच्चों को दूध पिलाना पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्पताल जैसे स्थानों पर यह सुविधा सबसे पहले उपलब्ध होनी चाहिए। भीड़ के बीच प्राइवेसी तलाशती हैं महिलाएं सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों में सबसे बड़ी समस्या प्राइवेसी की है। छोटे बच्चे को समय पर ब्रेस्ट फीडिंग कराना उसकी जरूरत है, लेकिन महिलाओं को पहले ऐसी जगह ढूंढनी पड़ती है जहां लोगों की नजर कम हो। कई महिलाएं दुपट्टे या चादर की मदद से बच्चे को दूध पिलाने की कोशिश करती हैं, जबकि कुछ बच्चे भीड़ और शोर के कारण दूध नहीं पी पाते। इससे मां और बच्चे दोनों असहज हो जाते हैं। कई बार महिलाएं अपना काम जल्दी छोड़कर घर लौट जाती हैं। महिला एवं बाल स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक स्थानों पर सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी भी है। सार्वजनिक स्थानों पर क्यों जरूरी है ब्रेस्टफीडिंग रूम विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ जन्म के एक घंटे के भीतर ब्रेस्ट फीडिंग शुरू कराने और छह महीने तक केवल मां का दूध देने की सलाह देते हैं। ऐसे में यदि मां कई घंटों तक सरकारी दफ्तर या अस्पताल में रहती है तो बच्चे को समय पर दूध पिलाना जरूरी हो जाता है। लेकिन प्रयागराज के अधिकांश सार्वजनिक परिसरों में इसके लिए अलग स्थान नहीं होने से महिलाओं को परेशानी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि मातृ और शिशु स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। यदि सुरक्षित और निजी स्थान उपलब्ध हो तो महिलाएं बिना झिझक बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग करा सकेंगी और बच्चे का पोषण भी प्रभावित नहीं होगा। दूसरे शहरों में शुरू हो चुकी है पहल देश के कई शहरों में रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, मॉल, मेट्रो स्टेशन और सरकारी कार्यालयों में मदर केयर रूम या ब्रेस्टफीडिंग रूम की व्यवस्था की जा चुकी है। इन कमरों में बैठने की सुविधा, साफ-सफाई, पेयजल, बिजली, बेबी चेंजिंग स्टेशन और पर्याप्त प्राइवेसी दी जाती है। इसका उद्देश्य महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर सम्मानजनक माहौल देना है। प्रयागराज में भी बड़ी संख्या में महिलाएं रोज सरकारी परिसरों और अस्पतालों में पहुंचती हैं। ऐसे में नगर निगम, विकास भवन, कलेक्ट्रेट, कचहरी, एसआरएन और बेली अस्पताल जैसे स्थानों पर इस तरह की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। CASE 1 नगर निगम में बच्चे को दूध पिलाने के लिए सीढ़ियों का सहारा अल्लापुर की पूजा सिंह जन्म प्रमाण पत्र के काम से छह महीने की बेटी के साथ नगर निगम पहुंचीं। काउंटर पर लंबी लाइन होने से उन्हें करीब ढाई घंटे इंतजार करना पड़ा। इसी दौरान बच्ची रोने लगी, लेकिन परिसर में ब्रेस्टफीडिंग के लिए अलग जगह नहीं मिली। काफी देर तक इधर-उधर देखने के बाद उन्होंने सीढ़ियों के पास कम भीड़ वाला हिस्सा चुना और दुपट्टे की आड़ में बेटी को दूध पिलाया। उनका कहना है कि सरकारी दफ्तरों में महिलाओं के लिए ऐसी सुविधा होनी चाहिए। CASE 2 विकास भवन में फाइल से ज्यादा बच्चे की चिंता रही झूंसी की नेहा यादव विकास भवन में आय प्रमाण पत्र बनवाने पहुंचीं। गोद में आठ महीने का बेटा था। दस्तावेज जांच और अलग-अलग काउंटरों पर लगभग तीन घंटे लग गए। इसी दौरान बच्चे को भूख लग गई। उन्होंने कई कर्मचारियों से अलग कमरे के बारे में पूछा, लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था नहीं मिली। आखिरकार उन्होंने भवन के एक शांत कोने में बैठकर बच्चे को दूध पिलाया। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति हर मां के लिए असहज होती है। CASE 3 एसआरएन अस्पताल में इलाज से पहले बच्चे को संभालना पड़ा कीडगंज की सबा परवीन अपने चार महीने के बेटे को लेकर एसआरएन अस्पताल की ओपीडी पहुंचीं। डॉक्टर से मिलने और जांच में काफी समय लग गया। इंतजार के दौरान बच्चा लगातार रोने लगा। अस्पताल में अलग ब्रेस्टफीडिंग रूम नहीं होने के कारण उन्हें भीड़भाड़ वाले कॉरिडोर में ही बच्चे को दूध पिलाना पड़ा। उनका कहना है कि अस्पताल में इलाज जितना जरूरी है, उतनी ही जरूरी मां और बच्चे के लिए सुरक्षित और निजी जगह भी है। CASE 4 कचहरी में सुनवाई के बीच बच्चे को लेकर भटकती रहीं दारागंज की अर्चना मिश्रा पारिवारिक मामले की सुनवाई के लिए कचहरी पहुंचीं। सुनवाई शुरू होने में काफी समय लग गया। गोद में दस महीने की बच्ची थी, जिसे बीच-बीच में दूध पिलाना जरूरी था। परिसर में अलग कमरा नहीं होने के कारण उन्होंने कई जगह तलाश की, लेकिन हर तरफ लोगों की आवाजाही थी। आखिरकार एक बरामदे के कोने में बैठकर उन्होंने बच्ची को दूध पिलाया। उनका कहना है कि महिलाओं के लिए ऐसी छोटी सुविधा भी बड़ी राहत बन सकती है। कहां सबसे ज्यादा जरूरत नगर निगम विकास भवन कलेक्ट्रेट कचहरी अस्पताल क्या होनी चाहिए सुविधा अलग और सुरक्षित कमरा आरामदायक कुर्सी बेबी चेंजिंग स्टेशन साफ पेयजल वॉश बेसिन पर्याप्त रोशनी और वेंटिलेशन नियमित साफ-सफाई
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