राम सेतु बनने से पहले क्यों शांत हो गया था उफनता समुद्र? श्रीराम के महाक्रोध और दिव्य बाण का अनसुना प्रसंग

Ramayana Katha: सनातन की सबसे बड़ा महाकाव्य रामायण तमाम रोचक प्रसंगों से भरी पड़ी है. इसमें कुछ अनसुने किस्से वास्तव में बार-बार पढ़ने या सुनने का मन करता है. ऐसा ही एक प्रसंग राम सेतु से जुड़ा है. जी हां, रामायण में वर्णित राम सेतु का निर्माण एक ऐतिहासिक या धार्मिक घटना ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के धैर्य, धर्म और दिव्य शक्ति का अद्भुत उदाहरण भी है. बहुत कम लोग जानते हैं कि राम सेतु बनने से पहले समुद्र इतना उफान पर था कि पूरी वानर सेना लंका तक पहुंचने का मार्ग नहीं खोज पा रही थी. तब श्रीराम ने पहले विनम्रता से समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की, लेकिन जब तीन दिन तक कोई उत्तर नहीं मिला तो उनका धैर्य टूट गया. कहा जाता है कि, जब श्रीराम ने अपना दिव्य बाण उठाया, तो समुद्र की लहरें शांत हो गईं और पूरी सृष्टि कांप उठी. अब सवाल है कि आखिर, ऐसा क्या हुआ कि स्वयं समुद्र देव को प्रकट होकर श्रीराम से क्षमा मांगनी पड़ी? आइए जानते हैं यह रोचक प्रसंग- लंका तक पहुंचने की सबसे बड़ी चुनौती सीता हरण के बाद राम और लक्ष्मण समेत पूरी वानर सेना परेशान थी. फिर माता सीता का पता चलने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और वानर सेना समुद्र तट पर पहुंचे. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी विशाल समुद्र को पार करके लंका पहुंचना. उस समय न कोई पुल था और न ही समुद्र पार करने का कोई साधन. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रीराम ने युद्ध से पहले धर्म का पालन करते हुए समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की. उन्होंने तीन दिनों तक कुशासन बिछाकर तप किया और विनम्र निवेदन किया कि वे अपनी सेना सहित समुद्र पार करना चाहते हैं. ...जब भगवान श्रीराम का टूटा धैर्य भगवान राम ने तीन दिन तक समुद्र देव से विनम्र निवेदन किया. लेकिन, इसके बाद भी समुद्र देव ने कोई उत्तर नहीं दिया. तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि दुष्ट और अहंकारी के साथ अत्यधिक विनम्रता उचित नहीं होती. उन्होंने अपना धनुष उठाया और अग्निबाण चढ़ा लिया. कहा जाता है कि, जैसे ही श्रीराम ने दिव्य बाण संधान किया, समुद्र में भयंकर हलचल मच गई. ऊंची-ऊंची लहरें शांत होने लगीं, जलचर भयभीत हो उठे और चारों दिशाओं में कंपन महसूस होने लगा. देवता भी श्रीराम के इस तेज को देखकर आश्चर्यचकित हो गए. समुद्र देव ने क्यों मांगी क्षमा? भगवान श्रीराम के महाक्रोध को देखकर समुद्र देव तुरंत प्रकट हुए. उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि जल का स्वभाव तरल होना है, इसलिए वह स्वयं रास्ता नहीं बना सकते हैं. उन्होंने श्रीराम से क्षमा मांगी और बताया कि वानर सेना में मौजूद नल और नील को ऐसा वरदान प्राप्त है कि उनके स्पर्श से पत्थर भी जल पर तैर सकते हैं. समुद्र देव ने श्रीराम को सलाह दी कि नल-नील के नेतृत्व में समुद्र पर पुल का निर्माण कराया जाए. यही पुल आगे चलकर राम सेतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ. श्रीराम के दिव्य बाण का क्या हुआ? कुछ कथाओं के अनुसार, श्रीराम ने चढ़ाया हुआ दिव्य बाण व्यर्थ नहीं जाने दिया. उन्होंने उसे उत्तर दिशा की ओर छोड़ दिया, जिससे एक मरुस्थलीय क्षेत्र का निर्माण हुआ. कई परंपराओं में इसे राजस्थान के मरुस्थल या अन्य शुष्क क्षेत्रों की उत्पत्ति से भी जोड़ा जाता है. हालांकि, विभिन्न रामायण परंपराओं में इस प्रसंग के अलग-अलग विवरण मिलते हैं.
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